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देवी के धाम से हिमालयी नजारा

Surkanda Templeबड़े हिल स्टेशनों की चमक-दमक में अक्सर हम उनके आसपास की ज्यादा खूबसूरत जगहों को भूल जाते हैं। सैलानी ज्यादा लोकप्रिय जगहों पर ही आकर अटक जाते हैं। ऐसी ही बात सुरकंडा देवी के मंदिर के बारे में भी कही जा सकती है। सुरकंडा का मंदिर देवी का महत्वपूर्ण स्थान है। दरअसल गढ़वाल के इस इलाके में प्रमुखतम धार्मिक स्थान के तौर पर माना जाता है। लेकिन इस जगह की अहमियत केवल इतनी नहीं है। यह इस इलाके का सबसे ऊंचा स्थान है और इसकी ऊंचाई 9995 फुट है। मंदिर ठीक पहाड़ की चोटी पर है। इसके चलते जब आप ऊपर हों तो चारों तरफ नजरें घुमाकर 360 डिग्री का नजारा लिया जा सकता है। केवल इतना ही नहीं, इस जगह की दुर्लभता इसलिए भी है कि उत्तर-पूर्व की ओर यहां हिमालय की श्रृंखलाएं बिखरी पड़ी हैं। चूंकि बीच में कोई और व्यवधान नहीं है इसलिए बाईं तरफ हिमाचल प्रदेश की पहाडिय़ों से लेकर सबसे दाहिनी तरफ नंदा देवी तक की पूरी श्रृंखला यहां दिखाई देती है। सामने बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री यानी चारों धामों की पहाडिय़ां नजर आती हैं। यह एक  ऐसा नजारा है तो वाकई दुर्लभ है। गढ़वाल के किसी इलाके से इतना खुला नजारा देखने को नहीं मिलता। एक इसी नजारे के लिए इस जगह को मसूरी, धनौल्टी व चंबा जैसी जगहों से भी कहीं ऊपर आंका जा सकता है। और तो और, चूंकि सुरकंडा का मंदिर लगभग दस हजार फुट की ऊंचाई पर है, इसलिए यहां बर्फ भी मसूरी-धनौल्टी से ज्यादा गिरती है। मार्च की शुरुआत तक यहां आपको बर्फ जमी मिल जाएगी। फिर कद्दूखाल ठीक राजमार्ग पर स्थित होने की वजह से पहुंचना सहज होने के कारण भी यह जगह ज्यादा आकर्षक बन जाती है।

Surkanda Temple2सुरकुट पर्वत पर गिरा था सती का सिर जब राजा दक्ष प्रजापति ने हरिद्वार में यज्ञ किया तो पुत्री सती व उनके पति शंकर को आमंत्रित नहीं किया। इस अपमान से क्षुब्ध सती ने यज्ञ कुण्ड में प्राणों की आहुति दे दी। पत्नी वियोग में व्याकुल व क्रोधित भगवान शंकर सती के शव को लेकर हिमालय की ओर चल दिए। इस दौरान भगवान विष्णु ने महादेव का बोझ कम करने के लिए सुदर्शन चक्र को भेजा। इस दौरान सती के शरीर के अंग भिन्न जगहों पर गिरे। माना जाता है कि इस दौरान सुरकुट पर्वत पर सती का सिर गिरा तभी से इस स्थान का नाम सुरकंडा पड़ा। चंबा प्रखंड का जड़धारगांव देवी का मायका माना जाता है। यहां के लोग विभिन्न अवसरों पर देवी की आराधना करते हैं। मंदिर की समस्त व्यवस्था वही करते हैं। पूजा-अर्चना का काम पुजाल्डी गांव के लेखवार जाति के लोग करते है। सिद्धपीठों में मां सुरकंडा का महातम्य सबसे अलग है। देवी सुरकंडा सभी कष्टों व दुखों को हरने वाली हैं। नवरात्र व गंगादशहरे के अवसर पर देवी के दर्शनों से मनोकामना पूर्ण होती है। यही कारण है कि सुरकंडा मंदिर में प्रतिवर्ष गंगा दशहरे के मौके पर विशाल मेला लगता है।

Surkanda Temple3सुरकंडा में चढ़ाई के लिए नीचे कद्दूखाल से ऊपर चोटी तक सीढिय़ां बनी हुई हैं। सीढिय़ाँ ख़त्म होने के साथ ही ढ़ालनुमा पक्का रास्ता शुरू हो जाता है ! चढ़ाई काफ़ी खड़ी है इसलिए बहुत जल्दी ही थकान महसूस होने लगती है! मंदिर जाने के रास्ते में कुछ स्थानीय लोग खाने-पीने का समान और मंदिर में चढ़ाने के लिए प्रसाद बेचते हैं! रास्ते में जगह-जगह लोगों के आराम करने के लिए व्यवस्था भी है। जो लोग पैदल जाने में समर्थ नहीं है उन लोगों के लिए यहाँ खच्चरों की व्यवस्था भी है। एक तरफ के रास्ते (चढ़ाई) का खच्चर पर अमूमन 400 रुपये का खर्च है।

Surkanda Temple4कहां रुके

सुरकंडा या कद्दूखाल में रुकने की कोई बढिय़ा जगह नहीं। कद्दूखाल के पास कुछेक छोटे-बड़े गेस्टहाउस हैं, लेकिन कायदे की जगहें या तो धनौल्टी में हैं या फिर चंबा में। ज्यादातर सैलानी मसूरी में रुककर दिनभर के लिए सुरकंडा आने का कार्यक्रम बनाते हैं। मेरी सलाह में मसूरी में भीड़-भाड़ के बीच रुकने के बजाय धनौल्टी में रुकना बेहतर है। धनौल्टी व कद्दूखाल के बीच सड़क पर ही अच्छे रिजॉर्ट हैं और सस्ते गेस्टहाउस भी। वहां रुककर आसपास की जगहों को आसानी से घूमा जा सकता है। यह इलाका अपने सेब के बगीचों के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है। इसलिए भी मसूरी की तुलना में यह जगह ज्यादा सुकून देती है।

कैसे पहुंचे

सुरकंडा देवी के मंदिर के लिए कद्दूखाल से एक-डेढ़ किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई है। कद्दूखाल उत्तराखंड में मसूरी-चंबा राजमार्ग पर धनौल्टी और चंबा के बीच स्थित एक छोटा सा गांव है। कद्दूखाल धनौल्टी से सात किलोमीटर दूर है और चंबा से 23 किलोमीटर। चंबा व मसूरी से यहां जाने के लिए कई साधन हैं जिनमें टैक्सी व बसें आसानी से मिल जाती हैं। मसूरी यहां से 34 किलोमीटर और देवप्रयाग 113 किलोमीटर दूर है

रोपवे

सुरकंडा मंदिर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को जल्द ही रोप-वे की सौगात भी मिलने जा रही है। पांच करोड़ की लागत से 600 मीटर लंबे रोपवे का निर्माण पर्यटन विभाग पब्लिक प्राइवेट पार्टनर (पीपीपी) मोड से कराएगा। निर्माणदायी कंपनी दो साल में इसका निर्माण पूरा कर देगी। मां सुरकंडा देवी के दर्शन को हर वर्ष दूर-दराज से सैकड़ों श्रद्धालू पहुंचते हैं। अब कद्दूखाल से देवी मंदिर को रोप-वे से जोडऩे के लिए शासन से मंजूरी मिल गई है। पांच करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले छह सौ मीटर लंबे रोपवे का निर्माण एक कंपनी करेगी, जो 30 साल तक इसका संचालन भी करेगी। तीन साल से सुरकंडा देवी मंदिर रोपवे प्रोजेक्ट फाइलों में कैद था। सिद्धपीठ सुरकंडा देवी को रोपवे से जोडऩे का प्रस्ताव पर्यटन विभाग ने वर्ष 2012 में तैयार किया था। संभवत जून माह में रोपवे का काम शुरू कर दिया जाएगा। रोपवे प्रोजेक्ट के बनने के बाद वहां पर रोपवे संचालन के लिए स्थानीय युवाओं को वरीयता दी जाएगी। पर्यटन विभाग ने इसके लिए प्रस्ताव तैयार किया है। नॉन टैक्निकल कर्मचारियों के काम स्थानीय युवाओं से कराए जाएंगे। इस प्रोजेक्ट की खास बात ये है कि इसमें एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। सिर्फ बड़े पेड़ों की लॉपिंग की जाएगी।

सुरकंडा देवी के मंदिर की एक खास विशेषता यह बताई जाती है कि श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में दी जाने वाली रौंसली (वानस्पतिक नाम टेक्सस बकाटा) की पत्तियां औषधीय गुणों भी भरपूर होती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन पत्तियों से घर में सुख समृद्धि आती है। क्षेत्र में इसे देववृक्ष का दर्जा हासिल है। इसीलिए इस पेड़ की लकड़ी को इमारती या दूसरे व्यावसायिक उपयोग में नहीं लाया जाता।

Surkanda Temple5आसपास

सुरकंडा देवी (कद्दूखाल) से महज सात किलोमीटर दूर धनौल्टी है। धनौल्टी एक पर्यटक केन्द्र के रूप में पिछले 10-12 सालों में विकसित हुआ है। महानगरों के भीड़ भरे कोलाहलपूर्ण एवं प्रदूषित वातावरण से दूर यहां की शीतल ठंडी हवाओं का साथ पर्यटकों को फिर तरोताजा बना देता है। यहां के ऊंचे पर्वतों व घने वनों का नैसगिर्क एवं सुरम्य वातावरण धनौल्टी का मुख्य आकर्षण है। यहां स्थित आकाश को छूते देवदार के वृक्ष किसी कवि की कल्पना से भी आकर्षक और धनौल्टी के आभूषण हैं। टिहरी-गढ़वाल जनपद के अंर्तगत आने वाला यह मनोरम पर्यटक केन्द्र समुद्र तट से लगभग 2300 मी. की ऊंचाई पर है। धनौल्टी को देखकर लगता है, जैसे प्रकृति ने अपनी छटा के सभी रंग इस क्षेत्र में बिखेर दिए हैं। जो पर्यटक मात्र प्रकृति की गोद में विचरण के उद्देश्य से कहीं घूमने जाते हैं, उनके लिए यह जगह स्वर्ग के समान है। आजादी से पहले तक धनौल्टी पर्यटन स्थल नहीं था। यहां टिहरी नरेश की इस्पेक्शन बिल्डिंग होती थी। सन् 1950 में टिहरी नरेश की रियासत के राज्य में सम्मिलित होने के बाद यह बिल्डिंग तहसील के रूप में कार्य करने लगी। धनौल्टी तहसील में नायब तहसीलदार के संरक्षण में सभी सरकारी कार्य होते हैं। सर्दियों में धनौल्टी में अत्यधिक ठंड और बर्फबारी होने की वजह से यह तहसील थत्यूड़ (ब्लाक मुख्यालय में स्थानांतरित हो जाती है। धनौल्टी में सरकारी कार्यालय के नाम पर तहसील के अतिरिक्त एक बैंक, एक छोटा पोस्ट ऑफिस और एक जूनियर हाईस्कूल ही हैं। इंटर कॉलिज यहां से चार कि.मी. दूर भवान में स्थित है। धनौल्टी की मूल आबादी मात्र 400-500 है। ये सभी गढ़वाली लोग हैं, जो आसपास के गांवों से यहां आकर बस गए हैं। प्रत्येक वर्ष ग्रीष्म ऋतु में लगभग 25-30 हजार से अधिक पर्यटक धनौल्टी में डेरा डालते हैं। धनौल्टी में ठहरने के स्थान बहुत सीमित होने की वजह से पर्यटकों को कई बार रात बिताने मसूरी वापस जाना पड़ता है।

केरल की आबोहवा में होकर तरोताजा

सेहत के लिए सैरः केरल आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के लिए भी प्रसिद्ध है। दुनियाभर से लोग अद्भुत प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ उसकी चिकित्सा में खुद को चुस्त-दुरुस्त करने आते हैं

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Kairali-Shirodharaलाट पर गिरकर कपाट के साथ बहते गर्म तेल से मानो भीतर की सारी थकान, जड़ता पिघल-पिघल कर नीचे रिस रही थी। मेरे लिए यह पहला अनुभव था। इतना घूमने के बाद भी स्पा या आयुर्वेदिक मसाज के प्रति कोई उत्साह मेरे भीतर नहीं जागा था, पहली बार केरल जाकर भी नहीं। इसलिए केरल की दूसरी यात्रा में कैराली में मिला यह अहसास काफी अनूठा था क्योंकि शिरोधारा के बारे में काफी कुछ सुना था। माथे पर बहते तेल को एक जोड़ी सधे हाथ सिर पर मल रहे थे। दूसरे जोड़ी हाथ बाकी बदन का जिम्मा संभाले हुए थे। यूं तो अभ्यांगम समूचे बदन पर मालिश की अलग चिकित्सा अपने आप में है, लेकिन बाकी तमाम चिकित्साओं में भी सीमित ही सही, कुछ मालिश तो पूरे बदन की हो ही जाती है। फिल्मों, कहानी-किस्सों में राजाओं, नवाबों, जागीरदारों की मालिश करते पहलवानों के बारे में देखा-सुना था, मेरे लिए यह साक्षात वैसा ही अनुभव था। फर्क बस इतना था कि दोनों बगल में पहलवान नहीं थे बल्कि केरल की पंचकरमा और आयुर्वेद चिकित्सा में महारत हासिल दो मालिशिये थे। हर हाथ सधा हुआ था। निपुणता इतनी कि बदन पर ऊपर-नीचे जाते हाथों में सेकेंड का भी फर्क नहीं। ट्रीटमेंट कक्ष में कोई घड़ी नहीं थी लेकिन पूरी प्रक्रिया के तय समय में कोई हेरफेर नहीं। थेरेपिस्ट की कुशलता और उसका प्रशिक्षण कैराली की पहचान है। लगभग पचास मिनट तक गहन मालिश के बाद शरीर के पोर-पोर से मानो तेल भीतर रिसता है (बताते हैं कि शिरोधारा में लगभग दो लीटर तेल माथे पर गिरता है, तेल में नहाना तो इसके लिए बड़ी सामान्य सी संज्ञा होगी)।

Kairali-Abhyangamजिन्हें इसका अनुभव नहीं है, उनके लिए पहला मौका बड़ा मिला-जुला होगा, कभी बदन पर गरम तेल रखे जाते ही बेचैनी सी होगी तो, कभी लगेगा मानो बदन टूट रहा हो और कभी निचुड़ती थकान आपको मदहोश सा कर देगी। लेकिन कुल मिलाकर ऐसा पुरसुकून अहसास जो आपको पहली बार के बाद दूसरी बार के लिए बुलाता रहेगा। मालिश, जिसे रिजॉर्ट अपनी भाषा में ट्रीटमेंट या थेरेपी कहते हैं (आखिर मालिश बड़ा देहाती-सा लगता है) के बाद चिकना-चिपुड़ा बदन लेकर स्टीम रूम में ले जाया जाता है। सिर से नीचे के हिस्से को एक बक्से में बंद कर दिया जाता है और उसमें भाप प्रवाहित की जाती है। मालिश से बाद शरीर से निकले तमाम विषाणु भाप के चलते बाहर आ जाते हैं और पांच मिनट के भाप स्नान के बाद गरम पानी से स्नान आपके शरीर को तरोताजा कर देता है। वह ताजगी आपको आपको फिर वहां लौटने के लिए प्रेरित करती है, जैसे कि मुझे, लेकिन मैंने इस बार एलाकिझी थेरेपी चुनी। इसमें कपड़े की थैलियों में औषधीय पत्तियां व पाउडर बंधा होता है और उन थैलियों को गर्म तेल में भिगोकर उससे पूरे बदन की मालिश की जाती है।

Kairali-Ayurveda Foodथेरेपी केरल व कैराली में कई किस्म की है। आयुर्वेद व प्राकृतिक चिकित्सा के हाल में बढ़े प्रभाव के कारण बड़ी संख्या में लोग अलग-अलग मर्ज के इलाज के लिए यहां आने लगे हैं। लेकिन कैराली समेत यहां के तमाम रिजॉर्ट रोगों के इलाज के साथ-साथ आपके रोजमर्रा के जीवन के तनाव को कम करने और आपको नई ऊर्जा देने के लिए भी पैकेज डिजाइन करते हों। और तो और केरल के आयुर्वेद रिजॉर्ट हनीमून तक के लिए पैकेज देने लगे हैं। लेकिन बात किसी चिकित्सा पद्धति की हो तो अक्सर बात उसकी प्रमाणिकता की भी उठती है। उनकी काबिलियत उसी आधार पर तय होती है। आयुर्वेद को भुनाने को लेकर हाल में जिस तरह की होड़ शुरू हुई है, उसमें यह पता लगाना जरूरी हो जाता है कि आप जहां जा रहे हैं, वहां आपको आयुर्वेद के नाम पर ठगा और लूटा तो नहीं जा रहा। क्योंकि अव्वल तो वैसे ही ये पैकेज महंगे होते हैं, दूसरी ओर सामान्य अपेक्षा यह होती है कि आप कुछ दिन रुककर पूरा ट्रीटमेंट लें, तो खर्च उसी अनुपात में बढ़ जाता है।

Kairali2केरल  के पल्लकड़ जिले में स्थित कैराली आयुर्वेद रिजॉर्ट (कोयंबटूर से 60 किमी) को नेशनल जियोग्र्राफिक ट्रैवलर ने दुनिया के पचास शीर्ष वेलनेस स्थलों में माना है। किसी आयुर्वेद रिजॉर्ट की अहमियत उसके ट्रीटमेंट के साथ-साथ वहां के वातावरण, माहौल, आबो-हवा, खानपान और चिकित्सकों से भी तय होती है। कैराली के पास न केवल अपना ऑर्गनिक फार्म है जहां रिजॉर्ट में इस्तेमाल आने वाली सारी सब्जियां उगाई जाती हैं, बल्कि एक एकड़ में फैला हर्बल गार्डन भी है, जहां केरल में मिलने वाले ज्यादातर औषधीय पौधों को संरक्षित करने की कोशिश की गई है। 15 एकड़ में फैले रिजॉर्ट में हजार से ज्यादा नारियल के वृक्ष हैं और नौ सौ से ज्यादा आम के। इतनी हरियाली और इतनी छांव कि तपते सूरज की गरमी और बरसते आसमान का पानी नीचे आप तक पहुंचने में कई पल ज्यादा ले लेता है।

कैराली में कुल 30 कॉटेज हैं और इनमें से हरेक अपनी खास डिजाइन में है। कोई भी दो एक दूसरे से मिलते नहीं हैं। दो महाराजा स्वीट को छोड़कर बाकी 28 कॉटेज के नाम 28 अलग-अलग राशियों पर हैं। उनका डिजाइन भी उसी अनुरूप है। वास्तु का भी यहां विशेष ध्यान रखा गया है। यहां ठहरने वाले कई लोग अपनी राशि के हिसाब से अपने ठहरने का कॉटेज भी चुनते हैं। सारे कॉटेज पेड़ों के बीच में हैं लेकिन कभी किसी निर्माण के लिए कोई पेड़ काटा नहीं गया।

सबके लिए आयुर्वेद

Kairali1केरल और आयुर्वेद की बात जब हम करते हैं तो केवल अभ्यांगम, शिरोधारा आदि ही ध्यान में रहते हैं। लेकिन कैराली सरीखे आयुर्वेदिक घराने कई और मामलों में भी इसे लोकप्रिय बना रहे हैं। खास तौर पर महिलाओं के लिए सौंदर्य व सौष्ठव के लिए भी कई उत्पाद लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं। हानिकारिक रसायनों से बचने के लिए लोग रोजमर्रा के इस्तेमाल के उत्पादों में आयुर्वेद को अपना रहे हैं। यूं तो केरल के आयुर्वेद का मुख्य आधार वहां की पंचकर्मा पद्धति है। पंचकर्मा में विभिन्न तेलों के इस्तेमाल से शरीर को फिर से ऊर्जावान बनाने की प्रक्रिया होती है। कैराली का कहना है कि चरक संहिता में लिखी पद्धतियों के अनुरूप इसका पालन किया जाता है। इसके अलावा भी कई तरह के इलाज यहां होते हैं। इनमें प्रमुख हैं- विशेष हर्बल मसाल थेरेपी, रिजुवनेशन व डिटॉक्सीफिकेशन के लिए संपूर्ण इलाज, साइनस व माइग्रेन का विशेष इलाज, गर्भावस्था के उपरांत विशेष ट्रीटमेंट, विशेष सौंदर्य देखरेख व नेत्र चिकित्सा, दबाव व तनाव दूर करने के लिए कैराली का विशेष इलाज, वजन घटाने के लिए कैराली का विशेष इलाज, अर्थराइटिस व स्पोंडलाइटिस के लिए कैराली का विशेष इलाज।

पल्लकड और आसपास

Tipu Sultanयूं तो पल्लकड जिले को उस तरह से सैलानी नहीं मिलते जिस तरह से केरल के बाकी हिस्सों को मिलते हैं। फिर भी यहां सैलानियों के लिए बहुत कुछ हैं- खास व अनूठी जगहें। पल्लकड शहर में 1766 का बनाया हुआ टीपू का किला है जिसे हैदर अली ने बनवाया था और टीपू सुल्तान ने उसकी मरम्मत करवाई। यह किला अभी तक काफी दुरुस्त हाल में है। शहर के ही दूसरे छोर पर मलमपुषा जलाशय है। इस जलाशय के साथ-साथ बेहद सुंदर बगीचा, स्वीमिंग पूल, एक्वेरियम और स्नेक पार्क है। साथ ही इसके ऊपर दक्षिण भारत की संभवतया सबसे पहली रोपवे भी है, जिसपर सैर करके जलाशय व पार्क का हवा से खूबसूरत नजारा लिया जा सकता है। साइलेंट वैली नेशनल पार्क भी यहां से काफी नजदीक है।

परंपराएं जोड़ती व तोड़ती नंदा राजजात यात्रा

Nanda at Homkund. Photo : Jaimitra Bisht
Nanda at Homkund. Photo : Jaimitra Bisht

नंदा होमकुंड से कैलाश के लिए विदा हो गईं- रास्ते के तमाम कष्टों व तकलीफों को झेलते हुए। लेकिन नंदा को पहुंचाने होमकुंड या शिलासमुद्र तक गए यात्रियों के लिए नंदा को छोड़कर लौटने के बाद का रास्ता ज्यादा तकलीफदेह था। भला किसने कहा था कि चढ़ने की तुलना में पहाड़ से उतरना आसान होता है! चंदनिया घाट से लाटा खोपड़ी और फिर वहां से सुतौल तक की जो उतराई थी, वैसी विकट उतराई ट्रैकिंग के बीस साल से ज्यादा के अपने अनुभव में मैंने कम ही देखी-सुनी हैं। मुश्किल यह थी कि इसका किसी को अंदाजा भी न था। डर सब रहे थे ज्यूंरागली को लेकर और हालत पतली हुई नीचे उतर कर।

Yatris on hilly terrain
Yatris on hilly terrain

ज्यूंरागली का अर्थ स्थानीय भाषा में मौत की गली होता है। रूपकुंड की तरफ से चढ़कर शिला समुद्र की ओर उतरने का यहां जो संकरा रास्ता है, ऊपर धार (दर्रे) पर मौसम का जो पल-पल बदलता विकट रुख है, उन सबको ध्यान में रखकर इसका यह नाम कोई हैरत नहीं देता। फिर रूपकुंड में बिखरे नरकंकालों के बारे में तो कहा ही जाता है कि वे सदियों पहले ज्यूंरागली पार कर रहे किसी सैन्य बल के ही हैं। हालांकि तमाम अध्ययनों के बावजूद इसपर निर्णायक रूप से कोई कुछ नहीं कह सकता। कुछ स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार रूपकुण्ड दुर्घटना सन् 1150 में हुई थी जिसमें राजजात में शामिल होने पहुंचे कन्नौज नरेश जसधवल या यशोधवल और उनकी पत्नी रानी बल्लभा की सुरक्षा और मनोरंजन आदि के लिए सैकड़ों की संख्या में साथ आए दलबल की मौत हो गयी थी। उन्हीं के कंकाल आज भी रूपकुंड में बिखरे हुए हैं। 1942 में सबसे पहली बार पता चलने के बाद से इनपर काफी लोग शोध व डीएनए विश्लेषण तक कर चुके हैं, जिनमें नेशनल ज्योग्राफिक भी शामिल है। कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि कभी लोग स्वर्गारोहण की चाह में इसी स्थान से महाप्रयाण के लिए नीचे रूपकुंड की ओर छलांग लगाते थे। फिर लगभग 16 हजार फुट की ऊंचाई कोई कम भी तो नहीं। जाहिर था, नंदा राजजात यात्रा से पहले और यात्रा के शुरुआती दिनों के दौरान लोगों के बीच जिसका चर्चा व रोमांच सबसे ज्यादा था, वे रूपकुंड व ज्यूंरागली ही थे। लेकिन हैरानी की बात थी कि इस रास्ते पर लोग इतना परेशान नहीं हुए, जितना कि अंदेशा था। शायद यात्री, आयोजक व प्रशासन, सभी ज्यादा सतर्क थे। इसीलिए उतराई ने सबको चित्त कर दिया।

Yatra at Baijnath temple
Yatra at Baijnath temple

लिहाजा यह अकारण ही नहीं था कि न्यूनतम 12 साल के अंतराल पर होनी तय इस लगभग तीन सौ किलोमीटर की यात्रा के संपन्न होने के बाद, दो-तीन बातों की चर्चा सबसे ज्यादा रही- बेहद कष्टदायक उतराई और यात्रा में कई धार्मिक परंपराओं का टूटना। दबे स्वर में ही सही, इतने लोगों के एक साथ इतनी ऊंचाई पर जाने और उनके लिए होने वाले इंतजामों के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर का मुद्दा भी उठा। दूसरी बात का महत्व इसलिए भी है कि टूटती व बनती परंपराएं अगली राजजात का भी आधार बनेंगी। रही बात कष्ट की तो, ज्यादातर यात्री इसे नंदा की आराधना का ही एक पक्ष मानकर स्वीकार कर लेंगे। आखिर बात नंदा की है। नंदा कोई सामान्य देवी नहीं हैं, वह समूचे उत्तराखंड की आराध्या हैं। उत्तराखंड की समस्त देवियां उनमें समाहित हैं, वह सभी शक्तिपीठों की अधिष्ठात्री हैं। लोक इतिहास के अनुसार नंदा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुमाऊं के कत्युरी राजवंश की ईष्टदेवी थी। ईष्टदेवी होने के कारण नंदादेवी को राजराजेश्वरी भी कहा जाता है। यहां के लोगों के लिए बेटी भी हैं, शिव पत्नी पार्वती भी हैं, सती भी हैं, पार्वती की बहन भी हैं, दुर्गा भी हैं, लक्ष्मी भी हैं और सरस्वती भी। यही कारण है कि नंदा को समस्त प्रदेश में धार्मिक व सांस्कृतिक एकता के सूत्र के रूप में भी देखा जाता है। तमाम देवियों के छत्र-छंतोलियां, डोलियां व निशान इसी वजह से इस राजजात यात्रा में हाजिरी देते हैं और नंदा को ससुराल के लिए विदा करते हैं।

Traditional dance at Waan
Traditional dance at Waan

नंदकेसरी में गढ़वाल व कुमाऊं की यात्राओं के मिलन और फिर वाण में लाटू के मंदिर से पहाड़ के कठिन सफर के लिए नंदा की विदाई के मौके पर भक्ति का भावनात्मक प्रवाह नंदा में स्थानीय लोगों की अगाध श्रद्धा की गवाही दे रहा था। लेकिन देश, काल, परिस्थितियों के अनुसार धार्मिक परंपराएं बदलती हैं और नंदा देवी राजजात भी इसमें कोई अपवाद नहीं। परंपराओं के बदलने की वजहें कुछ भी हो सकती हैं। जैसे शुरुआती दौर में डोलियों व छंतोलियां की संख्या सीमित थी, लेकिन कालांतर में इनका प्रतिनिधित्व बढ़ने लगा। अब उत्तराखंड के दूर-दराज के इलाकों से छंतोलियां व निशान यात्रा में शिरकत करने लगे हैं। पिछली बार यानी 2000 में कुमाऊं की राजछंतोली पहली बार राजजात में शामिल हुई थी। इस बार सुदूर पिथौरागढ़ में मर्तोली से लंबा व दुष्कर सफर करके निशान यात्रा में शामिल हुआ। ऐसे कई उदाहरण हैं।

Bedni: highlight of the Yatra
Bedni: highlight of the Yatra

कई इतिहासकार कहते हैं कि यात्रा में पहले नरबलि का चलन था, उसके रुकने के बाद पशुबलि चलती रही। हालांकि अब वो भी रुक गई है। वाण के आगे रिण की धार से चमड़े की वस्तुएँ जैसे जूते, बेल्ट आदि व गाजे-बाजे, स्त्रियाँ-बच्चे, अभक्ष्य पदार्थ खाने वाली जातियाँ इत्यादि राजजात में निषिद्ध हो जाया करते थे। अभक्ष्य खाने वाली जातियों का तात्पर्य छिपा नहीं है। जातिगत श्रेष्ठता का तर्क यात्रा से पूरी तरह समाप्त तो नहीं हुआ है लेकिन कम बेशक हुआ है। अब बेरोकटोक महिलाएं पूरी यात्रा करने लगी हैं। इस लिहाज से यात्रा में प्रतिनिधित्व बढ़ने से कोई हर्ज तो नहीं होना चाहिए था।

Bare foot at 14K feets
Bare foot at 14K feets

लेकिन इस बढ़ती संख्या से यात्रा के स्वरूप में भी बदलाव आया है। तमाम छंतोलियां व डोलियां अपने साथ श्रेष्ठता का एक भाव भी लाती हैं। नौटी व कुरूड़ के बीच का विवाद तो काफी समय से है। नंदा में चूंकि स्थानीय लोगों की श्रद्धा अगाध है और राजजात में शिरकत करने वालों की संख्या कई हजारों में होती है, इसलिए छंतोलियों के क्रम व उनकी स्थिति को लेकर एक होड़ सी रहती है। लोगों की भेंट व चढ़ावा भी इसकी एक वजह होते हैं। ऐसे में यात्रा का मूल क्रम ही बिगड़ गया। मान्यता यह रहती थी कि यात्रा में सबसे आगे चौसिंघा खाड़ू चलता है और उसके पीछे लाटू का निशान, गढ़वाल व कुमाऊं की राज छंतोलियां और पीछे बाकी छंतोलियां व यात्री। लेकिन इस बार ऐसा कोई क्रम न था। छंतोलियां व यात्री अपनी जरूरत व सहूलियत के हिसाब से आगे पीछे चल रहे थे और पड़ाव तय कर रहे थे। नंदा यानी मुख्य यात्रा के होमकुंड पहुंचने से पहले ही कई यात्री व छंतोलियां होमकुंड में पूजा करके वापसी की राह पकड़ चुके थे। और तो और, यात्रा में इतने खाड़ू थे कि कौन सा मुख्य है, यात्री इसी भ्रम में थे। लेकिन यह सब भी उतनी बड़ी बातें नहीं थीं, जितनी इसके पीछे के अंतिर्निहित तनाव थे। मान्यतानुसार जिन लोगों को वाण से आगे नंदा की डोली उठानी थी, उन्हें उठाने ही नहीं दी गई, लिहाजा सुतौल के द्योसिंह देवता का निशान यात्रा पूरी किए बिना ही बेदनी बुग्याल से लौट गया। बदले में विवाद की आशंका में होमकुंड से लौटते हुए नंदा की डोली सुतौल रुकी ही नहीं, सीधे घाट चली गई जिसपर लोगों में खासी नाराजगी रही। ऐसे ही कुछ और भी विवाद रहे। इंतजामों को लेकर पतर-नचैनिया व बेदिनी में लोगों की जमकर नारेबाजी व विरोध प्रदर्शन का नजारा भी अखरने वाला था।

long wait to go towards Homkund
long wait to go towards Homkund

इतनी बड़ी यात्रा में इंतजामों की कमी स्वाभाविक थी। खास तौर पर यह देखते हुए कि यात्रियों की संख्या को लेकर न कोई अनुमान था और न ही उस अनुपात में इंतजाम। फिर ऊंचाई वाले इलाके में वाण से लेकर वापस सुतौल पहुंचने तक हर दिन बारिश हुई, जिससे इंतजामों पर असर पड़ा, रास्ते में तकलीफें बढ़ीं। राहत की बात यही थी कि इस सबके बावजूद यात्रा में कहीं कोई हादसा न हुआ। लेकिन ऐसे विकट इलाके में यात्रा का लगातार बढ़ता स्वरूप पर्यावरणविदों के लिए बड़ी चिंता का सवाल है। चमोली के एडीम व मेला अधिकारी एम.एस. बिष्ट कहते हैं कि सरकारी अनुमानों के मुताबिक 20 से 25 हजार यात्री वाण से ऊपर की ओर गए। बेदिनी से ऊपर का इलाका इतना संवेदनशील है कि वहां जोर से बोलने तक के लिए मना किया जाता है। हालांकि बेदिनी बुग्याल व रूपकुंड क्षेत्र रोमांच प्रेमियों व ट्रैकर्स में बेहद लोकप्रिय है। वहां की पारिस्थितिकी और प्राकृतिक खूबसूरती को कैसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सलामत रखा जाए, यह कम महत्व का मुद्दा नहीं।

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क्या है नंदा राजजात

Mysterious Roopkund!
Mysterious Roopkund!

आस्था, रहस्य व रोमांच। नंदा देवी की राजजात यात्रा इन सबका मिला-जुला रूप है। हजारों लोगों के रेले में राह दिखाता सबसे आगे चलता चार सींग वाला काला मेढ़ा, नंदादेवी की राजछंतोली के पीछे चलती उत्तराखंड के गांवों-गांवों से आई छंतोलियां, सबके साथ वीर व पश्वाओं की टोली- भक्ति से सराबोर होकर पहाड़ों को नापती। इसे हिमालयी कुंभ भी कहा जाता है क्योंकि कुंभ की ही तर्ज पर यह यात्रा 12 साल में एक बार होती है। स्वरूप में यह यात्रा है क्योंकि इसमें शिरकत करने वाले लोग 19 दिन तक एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव की ओर चलते रहते हैं। एशिया की इस सबसे लंबी यात्रा में लगभग तीन सौ किलोमीटर का सफर तय किया जाता है। इतना ही नहीं, इसमें से छह दिन की यात्रा हिमालय के कुछ सबसे दुर्गम, ऊंचाई वाले इलाके में की जाती है। पिछली यात्रा 2000 में हुई थी। इस लिहाज से 2012 में अगली यात्रा होनी थी। लेकिन उस साल एक मलमास (अधिक मास) के कारण यात्रा का संयोग नहीं बना। पिछले साल भी यात्रा की तारीखें तय हो गई थीं, लेकिन केदारनाथ इलाके में जो भयंकर तबाही जून में हुई थी, उसके बाद न तो प्रशासन में और न ही लोगों में यात्रा करने की हिम्मत बची थी। अब इस साल यह यात्रा हो रही है। यात्रा कब से हो रही है, इसका ठीक-ठीक कोई इतिहास नहीं मिलता। राजजात समिति के पास जो अभिलेख हैं, उनके अनुसार 1843, 1863, 1886, 1905, 1925, 1951, 1968, 1987 व 2000 में यात्रा का आयोजन हो चुका है। यानी बीते डेढ़ सौ साल में यह कभी भी 12 साल के अंतराल पर नहीं हो पाई है। जाहिर है, यह यात्रा से जुड़ी मान्यताओं व दुर्गमताओं, दोनों की वजह से है। बहरहाल, तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए इस साल 18 अगस्त को उत्तराखंड में कर्णप्रयाग के निकट नौटी से शुरू हुई यात्रा 6 सितंबर को नौटी में ही समाप्त हुई।

सतरंगी यात्रा का रोमांच

बेदनी बुग्याल और पीछे त्रिशूल पर्वत
बेदनी बुग्याल और पीछे त्रिशूल पर्वत

आली बुग्याल बेदनी से महज तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर है। खूबसूरती में भी वो बेदनी बुग्याल के उतना ही नजदीक है। कुछ रोमांचप्रेमी घुमक्कड़ आली को ज्यादा खूबसूरत मानते हैं। मुश्किल यही है कि आली को उतने सैलानी नहीं मिलते जितने बेदनी को मिल जाते हैं। जानकार लोग आली की इस बदकिस्मती की एक कहानी भी बताते हैं। किस्सा आली व ऑली में एक टाइपोग्राफी चूक का है। दोनों ही जगह उत्तराखंड में हैं। ऑली बुग्याल जोशीमठ के पास है और इस समय देश के प्रमुखतम स्कीइंग रिजॉर्ट में से एक है। कहा जाता है कि ऑली को मिलने वाली सुविधाएं आली को मिलनी तय थीं। लेकिन बस फैसला होते समय नाम में कोई हर्फ या हिजा इधर से उधर हुआ और आली की जगह ऑली की सूरत बदल गई। हालांकि मेरी नजर में ऑली के हक में एक बात और यह भी जाती है कि वह सड़क के रास्ते में है। जोशीमठ से ऑली के लिए सड़क भी है और रोपवे भी।

15 हजार फुट की ऊंचाई पर राजनीतिक बैनर
15 हजार फुट की ऊंचाई पर राजनीतिक बैनर

आली यकीनन खूबसूरत है, लेकिन बेदनी बुग्याल चूंकि बहुचर्चित रूपकुंड ट्रैक के रास्ते में है इसलिए सैलानी अपना बेस बेदनी को बनाते हैं। आली के साथ एक दिक्कत यह भी है कि वहां पानी का कोई स्रोत नहीं है। बेदनी में बड़ा सा तालाब है जो उसकी अहमियत बढ़ा देता है। इस तालाब का तर्पण आदि के लिहाज से धार्मिक महत्व भी है, लिहाजा इसे वैतरिणी कुंड भी कहते हैं। इसी बेदनी कुंड के एक किनारे मंदिर में नंदा, महिषासुर मर्दिनी और काली की अति प्राचीन मूर्तियां स्थापित हैं। वहीं पर शिव का भी मंदिर बना है। मान्यता यह है कि बेदनी में ही वेदों की रचना की गई, इसी से इस जगह का नाम बेदनी पड़ा। इसीलिए हर साल कुरूड़ में नंदा देवी के सिद्धपीठ से निकलने वाली छोटी जात बेदनी तक आती है और 12 साल में एक बार होनी तय राजजात का भी यह प्रमुख पड़ाव माना जाता है।

आगे मेेढ़ा और पीछे नंदा राजजात का यात्री
आगे मेेढ़ा और पीछे नंदा राजजात का यात्री

लगभग 11 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित बेदनी और लगभग 12 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित बेदनी से लगा हुआ आली लगभग 12 किलोमीटर के इलाके में फैले हुए हैं। मखमली घास के इन बुग्यालों में कई रंगों के फूल खिलते हैं। कई जड़ी-बूटियां यहां मिलती हैं। यहां के कुदरती नजारे, रंग बिरंगे फूलों से सजी मुलायम घास और कोहरे, बादल, धूप व बारिश की लुका-छिपी का खेल अदभुत व दुर्लभ है। बेदनी व आली में चारों तरफ फैले कई किलोमीटर के घास के ढलान स्कीइंग के बिलकुल माफिक हैं, लेकिन अभी उनका इस्तेमाल उस तरह से ज्यादा होता नहीं। स्थानीय लोग इन बुग्यालों पर भेड़-बकरी और घोड़े-खच्चर चराते हैं। बुग्याली घोड़े भी बेहद आकर्षक होते हैं और सुंदर-सजीले घोड़े इतनी ऊंचाई पर कुंलाचे मारते दिख जाएं तो भला क्या बात है।

वाण में कैंपिंग
वाण में कैंपिंग

इतनी ऊंचाई की एक और मनमोहक खूबसूरती यहां से सूर्योदय व सूर्यास्त का शानदार नजारा है। बेदनी बुग्याल के ठीक सामने एक तरफ नंदा घुंटी चोटी है और दूसरी तरफ त्रिशूल। आली से दिखने वाला नजारा तो और भी खूबसूरत है। मौसम खुला हो और तड़के जल्दी उठने की हिम्मत कर सकें तो इन चोटियों पर पड़ने वाली सूरज की पहली किरण की खूबसूरती का कोई जवाब नहीं। इसे केवल यहां आकर ही महसूस किया जा सकता है, तस्वीरें देखकर नहीं। इसीलिए राजजात यात्रा में शरीक होने वालों से यह हमेशा कहा जाता रहा है कि आगे का सफर बेशक कठिन है लेकिन जब निकलें हैं तो बेदिनी तक जरूर जाएं।

लेकिन बेदनी पहुंचना भी इतना आसान तो नहीं। पहाड़ी आलू के लिए प्रसिद्ध वाण इस रास्ते का आखिरी गांव हैं। यहां से लगभग तीन किलोमीटर की सामान्य चढ़ाई के बाद रण की धार नामक जगह आती है। उसके बाद लगभग दो किलोमीटर का ढलान है और फिर नीचे नदी पर बने पुल से गैरोली पाताल होते हुए डोलियाधार तक सात किलोमीटर की दम फुला देने वाली खड़ी चढ़ाई। कहा जाता है कि पहले यही पुल राजजात यात्रा के समय महिलाओं के लिए आखिरी सीमा हुआ करता था। नंदा को विदा करने औरतें उस पार नहीं जाती थीं। बहरहाल, अब महिलाएं होमकुंड तक पूरी राजजात बेहिचक करती हैं।

इनकी धुनी तो कहीं भी रम जााएगी
इनकी धुनी तो कहीं भी रम जााएगी

जब बेदनी जाने की धुन हो तो ऊंचाई नाप ही ली जाती है। लेकिन आपकी अपनी यात्रा धार्मिक श्रद्धा से प्रेरित न हो तो इतने मुश्किल रास्तों पर लोगों को नंगे पैर चढ़ते देख खासी हैरानी होती है। मेरे लिए बेदनी-रूपकुंड ट्रैक की यह पहली चढ़ाई थी। साथ ही यह अंदाजा भी था कि जिस भारी तादाद में लोग राजजात यात्रा में शामिल होकर ऊपर जा रहे हैं, उसमें इन जगहों की प्राकृतिक खूबसूरती को उस शिद्दत के साथ महसूस कर पाना मुमकिन नहीं होगा। हकीकत भी यही थी। अस्थायी हैलीपेड से दिन में दसियों उड़ानें भरता हेलीकॉप्टर, घास के ढलानों पर पसरी पड़ी सैकड़ों टेंटों की कई सारी कॉलोनियां, ठौर-ठिकाना न मिलने पर नारेबाजी करते श्रद्धालु- लगता नहीं था कि हम 12 हजार फुट की ऊंचाई पर हैं। बेदनी पहुंचते-पहुंचते हुई भारी बारिश ने पहले ही हालत पतली कर दी थी।

ब्रह्मकमल तोड़कर ले जाते यात्री
ब्रह्मकमल तोड़कर ले जाते यात्री

इसीलिए आली जाने का और भी मन था क्योंकि बेदनी को उसके मूल रूप में देखना दूभर था। इतनी ऊंचाई पर इतने लोगों के एक साथ पहुंचने का यह डर तो है ही। चमोली के एडीएम और राजजात यात्रा के लिए नियुक्त मेला अधिकारी एम.एस. बिष्ट का कहना था कि सरकारी अनुमानों के अनुसार बेदनी में 20 से 25 हजार के लगभग यात्री पहुंचे होंगे। इतने लोगों का एक साथ रुकना, उनके लिए (हजारों) टेंट जमीन में गाढ़े जाना, उनके लिए चाय-नाश्ते, खाने-पीने के इंतजाम करना, उठना-बैठना, पूजा-पाठ, शौच-नित्य कर्म… फिर उनके आने-जाने के लिए रास्ते तैयार करना- उस जगह के हाल की कल्पना की जा सकती है। एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव के बीच के रास्ते पर फैलने वाला कचरा अलग। उसपर भी मुश्किल यह थी कि बेदनी से ऊपर बगवाबासा का इलाका ब्रह्मकमल व फेनकमल से भरा है और सब तरफ जड़ी-बूटियां फैली पड़ी हैं। पहाड़ के लोग कई बूटियां पहचानते भी हैं। ऐसे में दुर्लभ फूलों और जड़ी-बूटियों को नोचकर अपने झोलों व बैगों में भरकर ले जाने वालों की भी तादाद कम न थी। ऊपर रूपकुंड में बिखरे पड़े सदियों पुराने रहस्यमय नरकंकाल सैलानियों, यात्रियों के लिए ट्रॉफी की तरह हो जाते हैं- कुछ उन्हें तमगे की तरह साथ रख लेते हैं, कुछ उनके साथ सेल्फी खींचने को बेताब रहते हैं। इसलिए वे कुंड में अपनी मूल जगह से दूर अलग-अलग कोनों पर चट्टानों पर विविध डिजाइन में सजे नजर आते हैं।

ऑली से इंद्रधनुषीय नजारा
ऑली से इंद्रधनुषीय नजारा

खैर, बेदनी में फुर्सत की शाम का फायदा उठाते हुए आली बुग्याल तक जाने की एक वजह यह भी थी कि बेदनी में कोई मोबाइल नेटवर्क काम नहीं कर रहा था और आली में उसके मिलने की उम्मीद थी। आली जाने वाला हम चार-पांच साथियों के अलावा और कोई न था। रास्ता आसान था। रिमझिम बारिश ने माहौल तो खूबसूरत कर दिया था लेकिन कैमरों को भी भीतर रहने के लिए मजबूर कर दिया था। अचानक बारिश थोड़ी हल्की हुई, दूर पश्चिम में क्षितिज में डूबते सूरज की हल्की सी रोशनी चमकी और देखते ही देखते पूरब का बादलों ढका आसमान इंद्रधनुषी रंगों में नहा गया। अरसे बाद दोहरा इंद्रधनुष देखा और अरसे बाद पूरा इंद्रधनुष देखा जो नजरों के सामने आसमान के पूरे विस्तार में एक छोर से दूसरे छोर तक अपनी प्रत्यंचा ताने हुए था। मेरे लिए पूरी नंदा राजजात यात्रा का सबसे खुशनुमा पल वही था।

किसी नई सैरगाह पर इस बार

इम्तिहान खत्म और गर्मियों की छुट्टियों का मौसम शुरू। घूमने और अपने भीतर के सैलानी को बाहर निकालने का बहुप्रतीक्षित समय। लेकिन इस बार अपनी उसी पुरानी लिस्ट को किनारे रखें- शिमला, कुल्लू-मनाली, देहरादून-मसूरी, दार्जीलिंग, श्रीनगर, ऊटी, नैनीताल से आगे के विल्प सोचें। ये सारी जगहें खूबसूरत हैं लेकिन सैलानियों की भीड़ से भरी हैं। यहां के बाजारों में रैला ज्यादा होता है और सुकून कम।इसलिए ऐसी जगहें चुनें जो खूबसूरत तो हों लेकिन जहां टूरिस्टों की मारा-मारी कम हो। जहां सुकून हो और वो पसंद व जेब के अनुकूल भी हों। ऐसी ही कुछ जगहों के बारे में-

बिनसरः सफेद चोटियों का बेमिसाल नजारा

Binsarकुमाऊं के हिमालयी इलाके के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक है बिनसर। नैनीताल से महज 95 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस जगह की ऊंचाई समुद्र तल से 2420 मीटर है। हिमालय का जो नजारा यहां से देखने को मिलता है, वह शायद कुमाऊं में कहीं और से नहीं मिलेगा। सामने फैली वादी और उसके उस पार बाएं से दाएं नजरें घुमाओ तो एक के बाद एक हिमालय की चोटियो को नयनाभिराम, अबाधित दृश्य। चौखंबा से शुरू होकर त्रिशूल, नंदा देवी, नंदा कोट, शिवलिंग और पंचाचूली की पांच चोटियों की अविराम श्रृंखला आपका मन मोह लेती है। और अगर मौसम खुला हो और धूप निकली हो तो आप यहां से बद्रीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री तक को निहार सकते हैं।

सवेरे सूरज की पहली किरण से लेकर सूर्यास्त तक इन चोटियों के बदलते रंग आपको इन्हें अपलक निहारने के लिए मजबूर कर देंगे। यहां से मन न भरे तो आप थोड़ा और ऊपर जाकर बिनसर हिल या झंडी धार से अपने नजारे को और विस्तार दे सकते हैं। बिनसर ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए भी स्वर्ग है। चीड़ व बुरांश के जंगलों से लदी पहाडि़यों में कई पहाड़ी रास्ते निकलते हैं। जंगल का यह इलाका बिनसर वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के तहत आता है। इस अभयारण्य में कई दुर्लभ जानवर, पक्षी, तितलियां और जंगली फूल देखने को मिल जाते हैं।

बिनसर से अल्मोड़ा लगभग तीस किलोमीटर दूर है। यहां से 35 किलोमीटर दूर जागेश्वर के प्रसिद्ध मंदिर हैं। बिनसर के नजदीक गणनाथ मंदिर भी है। यहा खली एस्टेट भी देखा जा सकता है जहां कभी यहां के तत्कालीन राजाओं का महल हुआ करता था।

कैसे पहुंचे: बिनसर के लिए सबसे नजदीक का रेलवे स्टेशन काठगोदाम है। वहां से अल्मोड़ा के रास्ते या नैनीताल के रास्ते सड़क मार्ग से बिनसर आया जा सकता है। काठगोदाम के लिए दिल्ली व लखनऊ से ट्रेनें हैं। सबसे निकट का हवाई अड्डा पंतनगर है।

कहां ठहरें: बिनसर में कई छोटे होटल, रिजॉर्ट व सस्ते लॉज हैं। कुमाऊं मंडल विकास निगम के भी खूबसूरत कॉटेज हैं। यहां सीजन में हजार रुपये रोजाना से लेकर सात-आठ हजार रुपये रोजाना तक के किराये पर कमरे मिल जाएंगे। कॉटेज ऐसा हो जहां कमरे की बॉल्कनी से हिमालय का नजारा मिलता हो तो क्या बात है।

कब जाएं: अप्रैल से जून और फिर सितंबर से नवंबर का समय यहां के लिए सबसे बेहतरीन है क्योंकि तब आसमान साफ होता है। नीले आसमान में हिमालय का नजारा बेहद आकर्षक होता है। सर्दियों में जाएं तो बर्फ का लुत्फ ले सकते हैं। बारिश के समय पहाड़ के तमाम रास्तों की ही तरह वहां के रास्ते जोखिम भरे हो जाते हैं।

 

पहलगामः जन्नत का एक हिस्सा यह भी

Pahalgamहममें से ज्यादातर पहलगाम को अमरनाथ यात्रा के बेस के तौर पर जानते हैं, लेकिन उसके अलावा भी पहलगाम कश्मीर घाटी की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है। पहलगाम यानी चरवाहों की घाटी। लिद्दर नदी के दोनों ओर की घाटी सत्तर व अस्सी के दशकों में बॉलीवुड का सबसे लोकप्रिय शूटिंग स्थल हुआ करती थी। यहां एक तो बॉबी हट है जिसमें ऋषि कपूर-डिंपल कपाड़िया की सुपर हिट फिल्म ‘बॉबी’ की शूटिंग हुई थी, तो एक बेताब घाटी है, जहां सन्नी देओल की पहली फिल्म ‘बेताब’ की शूटिंग हुई थी। कुछ रोमांटिक पल बिताने हों या सुकून के लम्हे… पहलगाम मन मोहने वाला है। घाटी, नदी और चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे बर्फीले पहाड़। रोमांच प्रेमियों के लिए ट्रैकिंग व राफ्टिंग के भी मौके हैं। लिद्दर नदी में अब खूब राफ्टिंग होने लगी है। उधर दो-तीन दिन के कई बड़े खूबसूरत ट्रैक भी हैं। आसपास के इलाके में घोड़े व खच्चर पर घूमने का भी अलग ही मजा है।

कैसे पहुंचे: पहलगाम कश्मीर के अनंतनाग जिले में है। पहलगाम पहुंचने का एकमात्र रास्ता सडक़ के जरिये है। अगर आप जम्मू से आ रहे हैं तो श्रीनगर से 45 किलोमीटर पहले खन्नाबल से पहलगाम की तरफ मुड़ सकते हैं। अगर हवाई जहाज से श्रीनगर आ रहे हैं तो वहां से बिजबेहड़ा के रास्ते पहलगाम लगभग 95 किलोमीटर पड़ता है। सडक़ से यह सफर दो-तीन घंटे में तय किया जा सकता है। अमरनाथ के रास्ते में चंदनवाड़ी पहलगाम से 16 किलोमीटर आगे है। अनंतनाग में ही कश्मीर घाटी की ट्रेन (बनिहाल-बारामुला) का रेलवे स्टेशन भी है।

कहां ठहरें: पहलगाम में कई छोटे होटल, रिजॉर्ट व सस्ते लॉज हैं। जेकेटीडीसी के भी कॉटेज हैं। यहां सीजन में हजार रुपये रोजाना से लेकर सात-आठ हजार रुपये रोजाना तक के किराये पर कमरे मिल जाएंगे। लिद्दर नदी के किनारे किसी कॉटेज से नजारा ही अलग होता है।

कब जाएं: अप्रैल से जून और अक्टूबर-नवंबर का समय जाने के लिए सबसे बेहतर। बारिश और सर्दियों के महीने में टूरिस्टों की भीड़ कम रहती है। सर्दियां बेहद ठंडी और बर्फीली होती हैं, लेकिन तब आप स्कीइंग का मजा ले सकते हैं। जून में तो अमरनाथ यत्रियों की आवाजाही शुरू हो जाती है इसलिए वहां भीड़ भी हो जाती है और चीजें महंगी भी हो जाती हैं। लेकिन अप्रैल-मई में वहां हर लिहाज से सुकून होता है।

 

तवांगः पूर्वोत्तर में जन्नत

tawangहाल के सालों में अरुणाचल प्रदेश का यह हिल स्टेशन खासा चर्चा में रहा है। जितना भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के चलते, उतना ही एक नए पर्यटन आकर्षण के तौर पर। तवांग पूर्वोत्तर भारत की सात बहनों की सबसे खास पहचान के तौर पर सामने उभरा है। मन मोहने वाली अछूती प्राकृतिक खूबसूरती। तवांग की सबसे ज्यादा लोकप्रियता वहां की बौद्ध मोनेस्ट्री के लिए है जो भारत की सबसे बड़ी मोनेस्ट्रियों में से एक है। इसका निर्माण 350 साल पहले 5वें दलाई लामा की देखरेख में हुआ था। मोम्पा जनजाति का बसेरा तवांग इलाका एक अलग ही सांस्कृतिक पहचान रखता है। छठे दलाई लामा का जन्म इसी जनजाति में हुआ था। यहां का हैंडीक्राफ्ट बेहद मशहूर है और उतना ही मशहूर है सेला टॉप पास जहां लगभग पूरे सालभर बर्फ रहती है। तेजपुर से तवांग के रास्ते में ही जसवंतगढ़ है। तवांग के आसपास देखने के लिए बर्फीली चोटियां हैं, झीलें हैं, झरने हैं। एडवेंचर टूरिज्म के नए गढ़ के रूप में उदय। ट्रैकिंग के कई नए रास्ते रोमांचप्रेमियों को लुभा रहे हैं। वहां तक पहुंचने का सफर लंबा और थकाऊ हो सकता है लेकिन एक बार पहुंचते ही यहां की खूबसूरती देखकर सारी थकान छूमंतर हो जाती है। तवांग को संस्कृतियों का मिलनबिंदु भी कहा जाता है। तवांग के रास्ते ही 1962 में चीन ने भारत पर हमला किया था। उस लड़ाई में मारे गए भारतीय सैनिकों की याद में वहां एक स्मारक भी बना हुआ है।

कैसे पहुंचे: ट्रेन से या हवाई जहाज से असम में गुवाहाटी या तेजपुर पहुंचे। तवांग का रास्ता गुवाहाटी से 13 घंटे और तेजपुर से 10 घंटे का है। वैसे तवांग के लिए गुवाहाटी से रोजाना और अरुणाचल की राजधानी इटानगर से हफ्ते में दो बार उड़ान भी है। सड़क के रास्ते जाएं तो भालुकपोंग में परमिट की जांच होती है। सीमावर्ती व संवेदनशील राज्य होने के कारण अरुणाचल के कुछ इलाकों में जाने के लिए इनर लाइन परमिट की जरूरत होती है।

कहां ठहरें: तवांग में सरकारी टूरिस्ट लॉज और फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में रुकने की किफायती सुविधा है। बीस से ज्यादा निजी होटल भी हैं जिनमें तीन सौ रुपये से लेकर ढाई हजार रुपये रोजाना तक रुका जा सकता है।

कब जाएं: सबसे बढिय़ा समय अप्रैल से अक्टूबर, लेकिन मई-जून के महीने खासी बारिश वाले हो सकते हैं। वैसे वहां पूरे सालभर जाया जा सकता है। सर्दियों में रातों का तापमान शून्य से नीचे चला जाता है।

 

लाचुंगः सबसे खूबसूरत गांव

Lachungअपने चमत्कृत कर देने वाली खूबसूरती के लिए इसे कई लोग सबसे सुंदर गांव भी कहते हैं। उत्तर सिक्किम में साढ़े आठ हजार फुट से भी ज्यादा ऊंचाई पर लाचुंग चू नदी के किनारे बसा यह गांव बर्फीली चोटियों, शानदार झरनों, नदियों और सेब के बगीचों की वजह से सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। इतनी ऊंचाई पर ठंड तो बारहमासी होती है। लेकिन बर्फ गिरी हो तो यहां की खूबसूरती को नया ही आयाम मिल जाता है… जिसकी फोटो उतारकर आप अपने ड्राइंगरूम में सजा सकते हैं। इसीलिए लोग यहां सरदी के मौसम में भी खूब आते हैं। प्राकृतिक खूबसूरती के अलावा सिक्किम की खास बात यह भी है कि बर्फ गिरने पर भी उत्तर का यह इलाका उतना ही सुगम रहता है। पहुंच आसान हो तो घूमने का मजा ही मजा। बर्फ से ढकी चोटियां, झरने और चांदी सी झिलमिलाती नदियां यहां आने वाले सैलानियों को स्तब्ध कर देती हैं। लाचुंग ऐसी ही जगह है। आम तौर पर लाचुंग को युमथांग घाटी के लिए बेस के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। युमथांग घाटी को पूरब का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है। सेब के अलावा यहां के आड़ू व आलुबुखारे भी बहुत प्रसिद्ध हैं। इसकी अहमियत इसलिए भी है कि लाचुंग शिंग्बा रोडोडेंड्रन (बुरांश) सैंक्चुअरी और युमथांग घाटी का प्रवेश द्वार है। शिंग्बा सैंक्चुअरी में इतने रंगों के बुरांश हैं, जितने आपने देखे-सुने न होंगे। इसी तरह 12 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित युमथांग को फूलों की घाटी कहा जाता है। लाचुंग में एक सवा सौ साल पुराना गोम्पा भी है, जो बौद्ध उत्सवों के आयोजन का केंद्र है। यहां की खास संस्कृति और स्वशासन की पंचायत जुम्सा भी बेहद चर्चित है। इसलिए इस बार सिक्किम जाएं तो गंगटोक न रुकें, सुदूर उत्तर में लाचुंग तक जाएं।

कैसे पहुंचे: लाचुंग उत्तर में सिक्किम का आखिरी गांव है, राजधानी गंगटोक से लाचुंग 115 किलोमीटर दूर है। लगभग मंगन और चुंगथांग होते हुए खूबसूरत पहाड़ी सडक़ रास्ता लाचुंग जाता है। गंगटोक पहुंचने के लिए या तो बागडोगरा तक हवाई जहाज से या ट्रेन से जलपाईगुड़ी पहुंचे। वहां से गंगटोक के लिए टैक्सी या बस लें। गंगटोक से लाचुंग के लिए बसें व टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं।

कहां ठहरें: लाचुंग में बहुत ज्यादा सैलानी नहीं पहुंचते। ठहरने के लिए आम तौर पर सस्ते व अच्छे होटल मिल जाते हैं। रुकने के लिए एक डाक बंगला भी है।

कब जाएं: अप्रैल से जून तक का समय शिंग्बा और युमथांग में फूलों के खिलने के लिए सबसे अनुकूल है। इस समय यहां की छटा देखते ही बनती है। जितना जल्दी जाएं, बेहतर। लाचुंग से युमथांग घाटी 24 किलोमीटर आगे है। युमथांग तक जीपें जाती हैं।

 

कूर्गः प्रकृति का चरम सुख

Coorgकुछ लोग कूर्ग को भी भारत का स्कॉटलैंड कहते हैं। पश्चिमी घाट में कर्नाटक दक्षिण-पश्चिमी सिरे पर कावेरी नदी की धाराओं से भरी-पूरी ब्रह्मïगिरि पहाडिय़ों में स्थित है कूर्ग। यह जिक्र पहले भी आया है कि केरल में मुन्नार से लेकर कूर्ग तक के रास्ते को दुनिया के सबसे खूबसूरत राइडिंग रास्तों में शुमार किया जाता है। पूरा इलाका चाय, कॉफी, इलायची व अन्य मसालों के बागानों से समृद्ध है। बहुत लोगों को नहीं पता होगा कि कूर्ग में भारत में तिब्बतियों की सबसे बड़ी बस्ती बायलाकुपे में है। यहां की नामद्रोलिंग मोनेस्ट्री में 40 फुट ऊंची बौद्ध प्रतिमाएं देखने को मिल जाएंगी। कुर्ग में इतिहास की झलक लेने के लिए किला, प्रकृति को निहारने के लिए झरने और रोमांच का मजा लेने के लिए ट्रैकिंग के मौके हैं। पहाडिय़ों, बादलों और धुंध के बीच सिमटे कूर्ग का दृश्य देखकर आपका मन बाग-बाग हो जाएगा। कुर्ग को कोडागु भी कहा जाता है और यह दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कॉफी में से एक के लिए माना जाता है। इसके एक तरफ कर्नाटक का मैसूर जिला है तो दूसरी तरफ केरल का वायनाड जिला। कोडागु जिले में तीन वन्यप्राणी अभयारण्य और एक नेशनल पार्क स्थित है। मडिकेरी के अलावा कूर्ग के मुख्य इलाके हैं विराजपेट, सोमवारपेट और कुशलनगर। मडिकेरी में ऐतिहासिक महत्व की कई जगहें हैं और मडिकेरी किला उनमें से एक है। मुद्दुराजा ने इस किले का निर्माण करवाया था, जिसे बाद में टीपू सुल्तान ने फिर बनवाया। किले में एक पुरानी जेल, गिरिजाघर और मंदिर भी है।

कैसे पहुंचे: कूर्ग जिले का मुख्यालय मदिकेरी में है। यहां के लिए सबसे नजदीकी हवाईअड्डा मैंगलोर है। मैंगलौर से बस में मडिकेरी पहुंचने में साढ़े 4 घंटे  लगते हैं, करीब इतना ही वक्त मैसूर से मडिकेरी पहुंचने में लगता है। बैंगलोर, मैसूर व कालीकट से भी मदिकेरी के लिए बसें व टैक्सियां हैं। ट्रेन से आप मैसूर या थालेसरी तक जा सकते हैं।

कहां ठहरें: मदिकेरी में फाइव स्टार रिजॉर्ट से लेकर सस्ते होटल तक, सब उपलब्ध हैं। अपने बजट के हिसाब से आप होटलों का चुनाव कर सकते हैं। अगर आप कूर्ग जाएं तो किसी होटल में ठहरने की बजाए होम-स्टे को तरजीह दें। यह बहुत अच्छा विकल्प है। भीड-भड़क्के और शोर-शराबे से दूर, प्रकृति की गोद में, एक घर में सुकून से वक्त बिताना किसे अच्छा नहीं लगता? खासतौर से जब उस घर में लजीज खाने के साथ-साथ तमाम सुविधाएं भी मिलें।

कब जाएं: जून से अगस्त तक के महीने यहां भारी मानसूनी बारिश के होते हैं। जुलाई से सितंबर के महीनों में यहां के झरनों का भरपूर आनंद लिया जा सकता है। मई के शुरुआत तक यहां मौसम सुहाना बना रहता है। अप्रैल व मई में समूचा इलाका कॉफी की महक से गमकता रहता है।

 

मिरिकः झील के उस पार

Mirikअबकी बार गर्मियों की छुट्टियां मनाने के लिए दार्जीलिंग का नाम जेहन में आए तो बजाय वहां के मिरिक का रुख कर लें। सुमेंदु झील के चारों ओर बसा मिरिक खूबसूरत है, शांत है और दार्जीलिंग की तुलना में ज्यादा पास है। दार्जीलिंग की ही तरह मिरिक का भी कुछ हिस्सा अंग्रेजों द्वारा ही बसाया गया है। सुमेंदु झील के चारों ओर टहलते हुए, दूर क्षितिज में कंचनजंगा को निहारते हुए बड़ी सुखद अनुभूति होती है। सुमेंदु झील के चारों ओर का यह रास्ता लगभग साढ़े तीन किलोमीटर का है। आसपास चाय के बागान भी मिरिक को दार्जीलिंग जैसी अनुभूति देते हैं। मिरिक अपने ऑरेंज व ऑर्किड, दोनों के लिए जाना जाता है। इसके अलावा मिरिक में बोकर मोनेस्ट्री है, टिंगलिंग व्यू प्वाइंट है और कंचनजंगा पर उगते सूरज की आभा देखने के लिए सनराइज प्वाइंट है। कहा जाता है कि मिरिक शब्द लेपचा शब्दों मिर-योक से बना है, जिनका अर्थ है आग से जली जगह। पिछले तीस सालों में यहां हुए टूरिज्म के विकास के चलते अब झील की दूसरी तरफ कृष्णानगर बस गया है जहां नए होटल व रिजॉर्ट बन गए हैं। मिरिक चर्च दार्जीलिंग जिले की सबसे बड़ी चर्च मानी जाती है। मिरिक के सबसे ऊंचे प्वॉइंट पर स्विस कॉटेज है।

कैसे पहुंचे: मिरिक सिलीगुड़ी से 52 किलोमीटर दूर हों। यहां से दार्जीलिंग 49 किलोमीटर है। सबसे निकट का रेलवे स्टेशन दिल्ली-गुवाहाटी रेलवे लाइन पर न्यू जलपाईगुड़ी है। सबसे निकट का हवाई अड्डा बागडोगरा है, जो मिरिक से 52 किलोमीटर दूर है। सिलीगुड़ी व दार्जीलिंग से मिरिक के लिए टैक्सी मिल जाती हैं।

कहां ठहरें: मिरिक में ज्यादातर होटलें कृष्णानगर इलाके में हैं। कई लॉज व गेस्ट हाउस भी हैं। वन विभाग का भी एक खूबसूरत रेस्ट हाउस है और हैलीपेड के निकट एक होटल हिल काउंसिल का भी है।

कब जाएं: मिरिक देश के उस हिस्से में है जहां आम तौर पर बहुत ज्यादा गर्मी नहीं पड़ती। यहां लगभग पूरे सालभर मौसम खुशनुमा रहता है। सर्दियां बेहद ठंडी होती हैं। वैसे मार्च से मई और सितंबर से नवंबर का समय सर्वश्रेष्ठ है।

 

कांगड़ाः प्रकृति व संस्कृति

Kangraकांगड़ा घाटी निचले हिमालयी इलाकों की सबसे सुंदर घाटियों में से एक है। सामने नीले आसमान में चमकती धौलाधार श्रृंखलाओं की बर्फीली चोटियां, बगल में पीले सरसों के खेत और उनके बीच से छोटी लाइन की ट्रेन का छुक-छुक सफर… कांगड़ा घाटी की यह छवि बेहद लुभावनी है। कांगड़ा में प्रकृति और संस्कृति, दोनों की विविधता जबरदस्त है। धर्मशाला की ओर फिजा में बौद्ध धर्म है तो कांगड़ा की तरफ ब्रजेश्वरी देवी, चामुंडा देवी, बैजनाथ, ज्वालाजी जैसे हिंदू मंदिर हैं। ब्रजेश्वरी देवी को नगरकोट कांगड़े वाली माता भी कहा जाता है। कांगड़ा का इतिहास साढ़े तीन हजार साल पुराना बतलाया जाता है। कांगड़ा शहर से तीन किलोमीटर दूर स्थित कांगड़ा फोर्ट भी इतिहास की कई दास्तानें अपने में समेटे हुए है। इसे नगरकोट भी कहा जाता है। कांगड़ा फोर्ट एक समय पंजाब के पहाड़ी इलाकों पर शासन करने वाले कटोच राजाओं की राजधानी हुआ करता था। कांगड़ा घाटी के बीड़ व बिलिंग स्थान साहसिक खेलों से जुड़े हैं।

कैसे पहुंचे: कांगड़ा शहर धर्मशाला से 17 किलोमीटर, शिमला से 220 किलोमीटर और चंडीगढ़ से 235 किलोमीटर दूर है। धर्मशाला ही सबसे निकट का हवाईअड्डा है। ट्रेन से पठानकोट आकर कांगड़ा के लिए टैक्सी या बसें ली जा सकती हैं या फिर वहां से जोगिंदरनगर के लिए जाने वाली छोटी लाइन की गाड़ी से कांगड़ा जाया जा सकता है।

कहां ठहरें: कांगड़ा में रुकने के लिए बजट होटलों के अलावा कई किफायती होमस्टे विकल्प भी उपलब्ध हैं। कुछ महंगे रिजॉर्ट भी हैं। कांगड़ा के अलावा बैजनाथ, पालमपुर आदि स्थानों पर भी रुका जा सकता है। पालमपुर को आधार बनाकर सैलानी कांगड़ा घाटी के कई दर्शनीय स्थल सरलता से देख सकते हैं। प्रसिद्ध ऐतिहासिक बैजनाथ मंदिर पालमपुर से मात्र 18 किमी. दूर है। लगभग 1200 वर्ष प्राचीन यह मंदिर वास्तुशिल्प व पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

कब जाएं: जुलाई से सितंबर के महीने भारी बारिश वाले होते हैं। उन दिनों घूमने का लुत्फ नहीं लिया जा सकता। अप्रैल-मई और फिर अक्टूबर-नवंबर के महीने ज्यादा खुशनुमा होते हैं जब हिमालय के खुले नजारे मिल सकते हैं और मौसम ऐसा कि ज्यादा परेशानी भी न हो।

 

माथेरानः हिल स्टेशनों में अनूठा

Matheranपश्चिमी घाट में महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित माथेरान हिल स्टेशन दुनिया में उन गिनी-चुनी जगहों में से एक है जहां किसी भी किस्म के मोटर वाहन के जाने पर पूरी तरह पाबंदी है। माथेरान भारत का सबसे छोटा हिल स्टेशन भी माना जाता है। वाहनों का अभाव इसे बेहद शांत बना देता है और यही बाकी जगहों की तुलना में इसे थोड़ा खास बना देता है। कल्पना कीजिए ऐसी जगह की जहां कोई कार-स्कूटर-बस न हो। मानो आप थोड़ा अतीत में चले गए हों, जहां केवल घोड़े-खच्चर हों और हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा। दस्तूरी नाका से आगे वाहनों के जाने पर पाबंदी है। माथेरान में बंदरों की खासी आबादी है और औषधीय वनस्पतियां भी खूब हैं। माथेरान में 28 व्यू प्वाइंट, दो झीलें, दो पार्क हैं। सारे व्यू प्वाइंट का मजा लेने के लिए दो-तीन का समय लग जाता है। एलेक्जेंडर प्वाइंट, आर्टिरट प्वाइंट, रामबाग प्वाइंट, लिटिल चौक प्वाइंट, हनीमून प्वाइंट, वन ट्री हिल प्वाइंट, ओलंपिया रेसकोर्स, लॉर्डस प्वाइंट, हार्ट प्वाइंट, माउंट बेरी प्वाइंट, सेसिल प्वाइंट, पनोरमा प्वाइंट, स्पॉट लुईस प्वाइंट, इको प्वाइंट, नवरोजी लार्ड गार्डन आदि हैं। इसके अलावा माउंट बेरी और शार्लोट लेक भी यहां के मुख्य आकर्षण हैं। हनीमून पॉइंट पर रस्सी से घाटी को पार करने के लिए पर्यटक दूर-दूर से आते हैं। पेनोरमा प्वायंट से उगते हुए सूरज का ख़ूबसूरत नज़ारा है तो सनसेट प्वायंट पर सुदूर पहाडिय़ों के बीच गुम होता सूरज भी। शार्लोट लेक से पूरे माथेरान में पानी की सप्लाई होती है। झील के आस-पास का इलाका सुकून भरा है। कुछ दूर पिसरनाथ मंदिर है। लॉर्ड्स प्वायंट भी नजदीकहै। यहां से आप सहयाद्रि पर्वत श्रृंखला से घिरा माथेरान देख सकते हैं। गौर से देखने पर प्रबलगढ़ किला भी नजर आता है। माथेरान कई तरह के जीवजंतुओं का भी बसेरा है।

कैसे पहुंचे: माथेरान मुंबई से सौ किलोमीटर और पुणे से 120 किलोमीटर दूर है। यही दोनों सबसे पास के हवाई अड्डे हैं। पुणे-मुंबई रेल लाइन पर नेरल स्टेशन से माथेरान के लिए छोटी लाइन की गाड़ी चलती है। 2007 में इस गाड़ी ने सौ साल पूरे कर लिए।

कहां ठहरें: माथेरान में चूंकि मुंबई व पुणे से सैलानियों की आवक बहुत ज्यादा है, इसलिए वहां बड़ी संख्या में हर बजट के अनुकूल रिजॉर्ट, होटल व कॉटेज हैं।

कब जाएं: जून से अगस्त तक का समय छोडक़र माथेरान साल में कभी जाया जा सकता है। अप्रैल-मई में वहां की ठंडी आबो-हवा का मजा लिया जा सकता है तो मानसून के बाद के समय में वहां की हरियाली का। तब वहां के सारे झरने व झीलें भी लबालब हो जाते हैं।

परदेसी परिंदों के नजारे

A migratory sea-gull
A migratory sea-gull

हवा में ठंडक कम हुई है। लेकिन सर्दी अभी गई नहीं है। हजारों किलोमीटर दूर सुदूर उत्तर के यहां से भी ज्यादा ठंडे इलाकों से प्रवासी पक्षी भारत में कई जगहों पर अभी बसेरा बनाए हैं। ऐसा वे हर साल करते हैं। बड़ी लंबी व दुष्कर उड़ान के बाद उनका अपने तय ठिकानों पर हर साल आना, वाकई कुदरत का बड़ा हैरतअंगेज करिश्मा है। अब जरा कल्पना कीजिए कि साइबेरिया (रूस, चीन व उत्तर कोरियाई इलाकों) के अमूर फॉल्कन हर साल 22 हजार किलोमीटर दूर अफ्रीका में प्रवास के लिए जाते हैं और इस दौरान वे बीच में भारत के उत्तर-पूर्व में नगालैंड में थोड़ा आराम करते हैं। यहां से अफ्रीका जाने के लिए यह पक्षी समुद्र के ऊपर चार हजार किलोमीटर की उड़ान बिना रुके भरता है। ऐसे ही कई पक्षी भारत में प्रवास के लिए आते हैं। दुनियाभर के पक्षी प्रेमी इस मौसम में भारत आते हैं, परिंदों की इस खूबसूरत दुनिया का नजारा लेने के लिए। बर्ड वाचिंग के शौकीनों के लिए भारत में कई जगहें हैं जहां वे दुर्लभ प्रवासी पक्षियों का नजारा ले सकते हैं। उनके घर लौटने में बस कुछ ही दिन बचे हैं। लिहाजा एक झलक उनमें से कुछ खास जगहों कीः

भरतपुर का घना

Bharatpurआगरा-जयपुर राजमार्ग पर आगरा से महज 55 किलोमीटर दूर राजस्थान में भरतपुर का केवलादेव घना पक्षी अभयारण्य है। कई लोग इस दुनिया का सबसे खूबसूरत, शानदार व संपन्न पक्षी विहार मानते हैं। दुनियाभर के पक्षी प्रेमियों व पक्षी विज्ञानियों के लिए यह किसी मक्का से कम नहीं है। वैसे तो यह पक्षी अभयारण्य है लेकिन आपको यहां कई और किस्म के वन्यप्राणी भी मिल जाएंगे। कई बार तो साथ ही लगे रणथंबौर से बाघ भी भटकते हुए यहां पहुंच जाते हैं। वैसे यहां अन्य कई जानवरों के अलावा पक्षियों की 366 प्रजातियां, फूलों की 379 किस्में, 50 तरह की मछलियां, सांप की 13 प्रजातियां, छिपकलियों की 5 प्रजातियां और कछुए की 7 प्रजातियां रिकॉर्ड की गई हैं। यहां की वनस्पतीय विविधता ही शायद अलग-अलग तरह के जीवन के लिए अनुकूल भी है। इन्हीं विशेषताओं के चलते इसे प्राकृतिक स्थानों की यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में भी शामिल किया गया है।

ढाई सौ साल पहले बने इस अभयारण्य का केवलादेव नाम पार्क में मौजूद शिव के प्राचीन मंदिर पर रखा गया है। 19वीं सदी के अंतिम दशक में भरतपुर के महाराजा ने खुद इस क्षेत्र का विकास किया। पहले यहां जंगल व बंजर भूमि थी। गड्ढों में बारिश का पानी इकट्ठा हो जाता था तो वहां पक्षी डेरा डालने लगते थे। तब राजघराने के लोगों ने पास में बहने वाली गंभीर नदी के पानी को नहरों के जरिये इस इलाके में पहुंचाया जिससे यहां नम इलाका और कम गहरी झीलें बन गईं। धीरे-धीरे यही परिंदों की सैरगाह बनने लगी। राजघराने के लोग और अंग्रेज पहले यहां शिकार किया करते थे। 1956 में इसे अभयारण्य और फिर 1981 में इसे नेशनल पार्क बना दिया गया। पक्षियों की इस सैरगाह में देशी-विदेशी साढ़े तीन सौ से भी ज्यादा प्रजातियों के पक्षी शरण लेते हैं। इनमें एक-तिहाई संख्या प्रवासी पक्षियों की है। इन प्रवासी मेहमानों में से ज्यादातर छह हजार किलोमीटर का सफर तय करके साइबेरिया व मध्य एशिया के बाकी देशों से सर्दियों की शुरुआत में आते हैं और अप्रैल में फिर से अपने इलाकों को लौट जाते हैं। हालांकि देशी प्रवासी पक्षी यहां बारिशों के बाद से ही आना शुरू हो जाते हैं। कई प्रकार के सारस, पेंटेंड स्टॉर्क, ग्रे हैरॉन, ओपन बिल, स्पून बिल, व्हाइट इबिस, सरपेंट ईगल आदि यहां देखे जा सकते हैं।

कब, कहां व कैसेः राजस्थान के भरतपुर में स्थित केवलादेव घना नेशनल पार्क दिल्ली से लगभग पौने दो सौ किलोमीटर दूर है। नवंबर से मार्च तक का समय प्रवासी पक्षियों को देखने के लिए बेहतरीन है। भरतपुर शहर से पार्क महज एक किलोमीटर दूर है। भरतपुर शहर दिल्ली, जयपुर व आगरा से रेल व सड़क से अच्छी तरह से जुड़ा है। पार्क के बाहर के इलाके में कई होटल हैं। पार्क के भीतर भी फॉरेस्ट लॉज और कुछ अच्छे रिजॉर्ट हैं।

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सुल्तानपुर में रौनक

Sultanpurदिल्ली में धौला कुआं से बमुश्किल 40 किलोमीटर दूर सुल्तानपुर बर्ड सैंक्चुअरी दिल्ली-एनसीआर के लिए सर्दियों के महीने के सबसे पसंदीदा वीकेंड डेस्टिनेशन में से एक है। इसे भारत के प्रमुख पक्षी अभयारण्यों में से एक माना जाता है। गुड़गांव से फर्रूखनगर के रास्ते पर स्थित इस बर्ड सैंक्चुअरी में पक्षियों की 250 से ज्यादा प्रजातियां देखने को मिल जाती हैं। साइबेरिया, चीन, यूरोप, तिब्बत व अफगानिस्तान से प्रवासी पक्षियों की सौ से ज्यादा प्रजातियां यहां सर्दियां गुजारने आती हैं। इनमें ग्रेटर फ्लेमिंगो, नॉदर्न पिनटेल, रोजी पेलिकन, वुड सैंडपाइपर, रफ, ब्लैक विंग्ड स्टिल्ट, कॉमन टील, कॉमन ग्रीनशैक, यलो वैगटेल, व्हाइट वैगटेल, नॉर्दन शोवलर, गैडवल, स्पॉटेड सैंडपाइपर, स्पॉटेड रेडशैंक, स्टार्लिंग, यूरेशियन वाइगेन, ब्लूथ्रोट  आदि शामिल हैं। चूंकि यहां देशी पक्षियों की संख्या भी खूब है, इसलिए यहां लगभग पूरे सालभर अच्छी संख्या में पक्षी देखने को मिल जाते हैं। यहां के निवासी पक्षियों में कॉमन हूप्पु, पैडीफील्ड पाइपिट, पर्पल सनबर्ड, लिटिल कॉर्मोरेंट, यूरेशियन थिक-नी, ग्रे फ्रैंकोलिन, ब्लैक फ्रैंकोलिन, इंडियन रोलर, कई तरह के किंगफिशर, आइबिस, इग्रेट्स, डव, बुलबुल, मैना, कबूतर, पैराकीट व स्टोर्क्स आदि शामिल हैं। लगभग 44.5 हेक्टेयर इलाके में फैले इस अभयारण्य को 1972 में सैलानियों के लिए खोला गया था। इस बर्ड सैंक्चुअरी को पैदल घूमने में लगभग दो घंटे का समय लग जाता है। पक्षियों को देखने के लिए यहां चार मचान भी बने हुए हैं। यहां नील गाय व ब्लैक बक भी देखने को मिल जाते हैं। प्रवासी पक्षियों के बसेरे सुल्तानपुर लेक से आगे भी फैले हैं। दिल्ली के कुछ इलाकों में प्रवासी पक्षियों की संख्या में आई गिरावट के बावजूद सुल्तानपुर में उनकी संख्या और प्राकृतिक माहौल कायम है।

कहां, कब व कैसेः सुल्तानपुर लेक हरियाणा के गुड़गांव जिले में है। गुड़गांव से फर्रूखनगर जाने वाले रास्ते पर चलें तो लगभग पंद्रह किलोमीटर बाद सुल्तानपुर पहुंचा जा सकता है। पर्यटन विभाग ने सैलानियों की सुविधा के लिए बुनियादी इंतजाम भी यहां किए हुए हैं। हरियाणा पर्यटन ने यहां गेस्ट हाउस बना रखा है और बर्ड म्यूजियम व वॉच टावर भी मौजूद हैं। दूर बैठे परिंदों को देखने के लिए दूरबीन भी किराये पर मिल जाती हैं। सर्दियों का समय प्रवासी पक्षियों को  देखने के लिए बेहतरीन लेकिन सुल्तानपुर उन पक्षी अभयारण्यों में से है जहां देसी निवासी पक्षी भी खूब हैं, इसलिए उन्हें देखने के लिए गर्मियों में भी जाया जा सकता है।

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कन्नौज का लाख-बहोसी

Lakh Bahosiउत्तर प्रदेश में छोटे-मोटे कई पक्षी विहार हैं। हालांकि भरतपुर या चिलिका जैसी प्रसिद्धि किसी को नहीं मिली लेकिन इसी वजह से वहां सैलानियों की भीड़ कम है, शोर-शराबा कम है और प्रवासी पक्षियों के विहार के लिए यह बिलकुल मुफीद है। इन्हें में से एक है लाख-बहोसी पक्षी विहार। कन्नौज से 40 किलोमीटर दूर स्थित दो तालाबों लाख व बहोसी को मिलाकर यह पक्षी विहार 1988 में स्थापित किया गया था। उत्तर प्रदेश के जिस इलाके में यह स्थित है, वह पर्यटन की दृष्टि से बेहद कम विकसित है इसलिए इनके बारे में ज्यादा चर्चा नहीं होती। जाहिर है, यहां बाकी सैलानी स्थलों की तरह रुकने, ठहरने व खाने की अच्छी सुविधाएं नहीं मिलेंगी। लेकिन प्रवासी पक्षी देखने का शौक हो तो फिर भला क्या बात है। और फिर, सैलानियों की भीड़-भाड़ का अभाव ही यहां की अल्हड़ खूबसूरती के बने रहने की वजह भी है। यहां कई तरह के स्टोर्क, किंगफिशर, क्रेन, गूज, आइबिस व डक के अलावा पक्षियों की अन्य कई दुर्लभ प्रजातियां देखने को मिल जाती हैं। जंगली मुर्गियों, उल्लुओं, बुलबुल व मैना आदि की भी कई किस्में यहां मिल जाती हैं। इनमें बार-हेडेड गूज, पिन टेल, कॉमन टेल, सैंड पाइपर वगैरह शामिल हैं। पक्षियों से संबंधित जानकारियों के लिए यहां एक पक्षी विज्ञान केंद्र भी है।

कब, कहां व कैसेः कन्नौज कानपुर-मथुरा मुख्य रेल मार्ग पर और दिल्ली-कोलकाता नेशनल हाईवे 24 (जीटी रोड) पर स्थित है। बहोसी तालाब का रास्ता सुगम है। आम तौर पर सैलानी वहीं जाते हैं। लाख के लिए बहोसी होकर जाना पड़ता है और वहां का रास्ता थोड़ा दुष्कर है। बहोसी कन्नौज से 40 किलोमीटर दूर है। ओरैया जिले में दिबियापुर से बहोसी तालाब की दूरी 38 किलोमीटर दूर है। कन्नौज के अलावा फफूंद (38 किलोमीटर) सबसे पास के रेलवे स्टेशन हैं। कन्नौज की तरफ से आने के लिए तिर्वा, इंदरगढ़ होते हुए बहोसी पहुंचा जा सकता है। दिबियापुर से आने पर कन्नौज की तरफ जाते हुए बेला से आगे कल्याणपुर के रास्ते में बहोसी पहुंचा जा सकता है। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार अब अपने ऐसे विहारों में सुविधाएं बढ़ाने पर ध्यान दे रही है, लेकिन अब भी लाख-बहोसी में कई बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। खाने-पीने को भी अच्छा ठिकाना नहीं। इसलिए फिलहाल अपनी तरफ से सारे इंतजाम करके ही जाएं तो बेहतर।

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गुजरात का नल सरोवर

Nal-Migratory bird flamingoगुजरात के अहमदाबाद व सुंदरनगर जिलों से सटा नल सरोवर अभयारण्य अहमदाबाद से लगभग 65 किलोमीटर की दूरी पर है। नल सरोवर भारत में ताजे पानी के बाकी नम भूमि इलाकों से कई मायनों में अलग है। उपयुक्त मौसम, भोजन की पर्याप्तता और सुरक्षा ही सैलानी पक्षियों को यहां आकर्षित करती है। सर्दियों में सैंकड़ों प्रजातियों के लाखों प्रवासी पक्षियों का जमावड़ा यहां रहता है। इतनी बड़ी तादाद में पक्षियों के डेरा जमाने के बाद नल में उनकी चहचाहट से रौनक बढ़ जाती है। नल में इन्हीं उड़ते सैलानियों की जलक्रीड़ाएं व स्वर लहरियों को देखने-सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग यहां प्रतिदिन जुटते हैं। यहां पक्षी विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, शोधार्थी व छात्रों का भी जमावड़ा लगा रहता है तो कभी-कभार यहां पर लंबे समय से भटकते ऐसे पक्षी प्रेमी भी आते हैं जो किसी खास परिंदे का फोटो उतारने की तलाश में रहते हैं। नल सरोवर अपने दुर्लभ जीवन चक्र के लिए जाना जाता है जिस कारण यह एक अनूठी जैवविविधता को बचाए हुए है। नल का वातावरण कई तरह के जीव-जंतुओं के लिए उपयुक्त है और एक भोजन श्रृंखला बनाता है। मूल रूप से यह बारिश के पानी पर निर्भर नम क्षेत्र है। सीजन की शुरुआत में यहां छोटे पक्षी ही आते हैं लेकिन जब नवंबर में मछलियां बड़ी हो जाती हैं तो भोजन की प्रचुरता व उचित वातावरण पाकर प्रवासी जल पक्षी भी यहां आने लगते हैं। दिसंबर से फरवरी तक इनकी संख्या अधिकतम होती है। नल एक खास प्रकार की जैवविविधता को बचाए हुए है। इस सरोवर में पिछली पक्षी गणनाएं बताती हैं कि नल में पक्षियों की संख्या साल दर साल बढ़ रही है। 2002 में यह संख्या 1.33 लाख थी, तो 2004 में यह 1.84 लाख रही, 2006 में यह बढ़कर 2.52 लाख हो गई। तब बत्तख व हंसों की संख्या 1.19 लाख व क्रेक्स, रेहस व कूट की संख्या 82 हजार थी। इस सरोवर में प्रसिद्ध फ्लेमिंगो की संख्या 5820 आंकी गई। सरोवर क्षेत्र में छोटे-बड़े कुल 300 टापू हैं। भूगर्भवेताओं का मानना है कि जहां पर आज नल सरोवर है वह कभी समुद्र का हिस्सा था जो खंभात की खाड़ी को कच्छ की खाड़ी से जोड़ता था। भूगर्भीय परिवर्तनों से जब समुद्र पीछे चला गया तो यह बंद मौसमी झील में तब्दील हो गया। सरोवर क्षेत्र में 225 किस्म के मेहमान पक्षी देखे गए हैं जिनमें से सौ किस्म के प्रवासी जल पक्षी हैं। इन पक्षियों में हंस, सुर्खाब, रंग-बिरंगी बतखें, सारस, स्पूनबिल, राजहंस,  किंगफिशर, प्रमुख हैं। कई बार यहां पर कुछ दुर्लभ पक्षी भी देखे गए हैं।

कब, कहां व कैसेः नल सरोवर के लिए आपको अहमदाबाद जाना होगा जो देश के प्रमुख नगरों से अच्छी हवाई व रेल सेवा से जुड़ा है। वहां से बस या टैक्सी से नल सरोवर पहुंचा जा सकता है। साठ किमी की दूरी को तय करने में डेढ़ घंटे लग ही जाते हैं। अभयारण्य की सीमा में गुजरात पर्यटन विकास निगम का एक गेस्ट हाउस है जो यहां पर एक रेस्तरां भी है। शोर न हो इसलिए सरोवर में मोटरबोट पूर्णतया प्रतिबंधित है। सरोवर की सैर के लिए बांस के चप्पुओं से खेने वाली नावें उपलब्ध रहती है। ये नावें अलग-अलग क्षमता वाली होती है। जैसे ही आप सरोवर में आगे बढ़ते है दूर-दूर मेहमान पक्षी नजर आने लगते हैं। पानी के अन्दर झांकने पर तलहटी में मौजूद जलीय जीवन भी आप देख सकते हैं। सरोवर में आपको निकटतम टापू तक ले जाया जाता है जिसतक आने जाने में दो से तीन घंटे तक लग जाते हैं। इस सैर के लिए वहां गाइड भी मिल जाते हैं। सरोवर के किनारे घुड़सवारी का आनंद भी ले लिया जा सकता है। यदि आप नल सरोवर के अलावा आसपास कुछ और देखना चाहते हों तो 60 किमी दूर लोथल जा सकते है जहां सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष देखे जा सकते हैं।

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चिलिका में विदेशी मेहमान

Northern Pin Tailओडिशा की चिलिका झील देश में प्रवासी पक्षियों का सबसे बड़ा ठिकाना है। यहां हर साल पहुंचने वाले पक्षियों की संख्या कई लाखों में है। कुल 1100 किलोमीटर की परिधि वाली यह झील उड़ीसा के तीन जिलों खुरदा, पुरी और गंजम में फैली है। यह एशिया में ब्रेकिश पानी (मीठे व खारे पानी की मिश्रित) की सबसे बड़ी झील है। दया नदी यहीं बंगाल की खाड़ी में मिलती है। इसे चिलिका लैगून भी कहा जाता है। यह देश के सबसे खूबसूरत प्राकृतिक इकोसिस्टम्स में से एक है। देश में इरावडी डॉल्फिन देखने का भी यही अकेला ठिकाना है। इस झील में पहुंचने वाले शुरुआती प्रवासी पक्षी मेहमानों में शोवलर, पिनटेल, गैडवल और पोचार्ड शामिल होते हैं। परिंदों का मुख्य अड्डा 15.53 वर्ग किलोमीटर में फैले नलबन में है। मगंलाजोड़ी, भुसंदपुर और कई अन्य जगहों पर भी पक्षी पहुंचते हैं। नलबन का इलाका पक्षी अभयारण्य के तौर पर घोषित है। वन विभाग के सूत्रों के आम तौर पर 170 प्रजातियों के कुल लगभग 9 लाख पक्षी चिलिका में पहुंचते हैं। इनमें से 4.05 लाख पक्षी तो केवल अभयारण्य क्षेत्र में ही आते हैं। उत्तर में कड़ाके की सरदी से बचने के लिए अफगानिस्तान, इराक, ईरान, पाकिस्तान, लद्दाख, हिमालयी क्षेत्र, मध्य एशियाई देशों, साइबेरिया आदि से परिंदे चिलिका में आते हैं। हर साल दशहरे के बाद से ही यहां पक्षी आने लग जाते हैं। फिर ये परिंदे गरमी की शुरुआत होते-होते लौट जाते हैं। आखिरकार प्रवास ढूंढना कोई छोटा-मोटा काम नहीं, कड़ी मेहनत लगती है इसमें। कल्पना कीजिए कि मंगोलिया से चिलिका आने वाले पक्षी पांच हजार से ज्यादा किलोमीटर की उड़ान बिना रुके पूरी करते हैं। है न हैरतअंगेज? इनके आगे सारी तकनीक फेल हैं। ऐसे परिंदों को उनके प्रवास में देखने का रोमांच अनूठा है।

कब, कहां, कैसेः चिलिका झील बहुत बड़ी है। यहां के परिंदों को देखने के लिए झीले में फैले पड़े  कई द्वीपों पर या उनके करीब जाना होता है। जाहिर है कि वो केवल नावों से ही हो सकता है। नलबन के अलावा कालीजई आईलैंड, हनीमून आईलैंड, ब्रेकफास्ट आईलैंड, बर्ड्स आईलैंड व परीकुड आईलैंड भी देखे जाते हैं। चिलिका झील में पुरी से भी जाया जाता है लेकिन आम तौर पर डॉल्फिन देखने के लिए। प्रवासी पक्षियों को देखने के लिए रम्भा, बरकुल व सातपाड़ा सबसे प्रमुख जगहें हैं। यहां से झील में जाने के लिए नावें मिल जाती हैं। इन तीनों जगहों पर रुकने के लिए उड़ीसा पर्यटन के गेस्ट हाउस मौजूद हैं। सभी जगहों के लिए पुरी व भुवनेश्वर से बस व ट्रेनें बड़ी आसानी से मिल जाती हैं। भुवनेश्वर रेल व हवाई मार्ग से देशभर से जुड़ा है। अक्टूबर से अप्रैल का समय यहां जाने के लिए सबसे बेहतरीन है।

भारत के कुछ अन्य प्रमुख पक्षी अभयारण्य

  1. सालिम अली पक्षी अभयारण्य, गोवा
  2. कुमारकोम पक्षी अभायारण्य, वेम्बांड लेक, केरल
  3. रंगनथित्तु पक्षी अभयारण्य, कर्नाटक
  4. वेदंथंगल पक्षी अभयारण्य, कर्नाटक
  5. कौनडिन्या पक्षी अभयारण्य, चित्तूर, आंध्र प्रदेश
  6. मयानी पक्षी अभयारण्य, सतारा, महाराष्ट्र

कहां करें लहरों से अठखेलियां

जब उत्तर भारत में मौसम सर्द हो तो समुद्र के किनारे जाकर रेत में पसरकर धूप सेंकने से ज्यादा सुकून भरा अहसास और क्या हो सकता है। भारत की यही खासियत है कि आप एक ही देश में कुछ घंटों के सफर में ही मौसम को दगा दे सकते हैं। भारत का समुद्र तट बहुत लंबा है- पश्चिम में गुजरात से लेकर केरल तक और पूरब में बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक साढ़े सात हजार किलोमीटर से भी ज्यादा। फिर अंडमान व लक्षद्वीप सरीखे द्वीपों के भी कई समुद्र तट हैं। इन्हीं में से छांटकर एक नजर भारत के उन कुछ समुद्र तटों पर जहां इन फाल्गुन की छुट्टियों में आप अपने परिवार के साथ जाकर लहरों से मौज-मस्ती कर सकते हैं

Varkala Beachकेरल का वर्कला

केरल के दक्षिणी छोर पर एक छोटा-सा शहर है वर्कला। पहली नजर में यह हल्की-फुल्की रफ्तार से चल रही एक उनींदी-सी जगह लगती है। लेकिन पहाड़ी पर पहुंचकर जैसे ही आप नीचे नजर दौड़ाते हैं तो एक दूसरी ही दुनिया नजर आती है। अगर आप गोवा, मुबंई या चेन्नई जैसे चर्चित पर्यटन स्थलों पर मटमैले और गंदगी से भरे हुए समुद्र तट देखकर उकता चुके हैं तो वर्कला उन सबसे अलग है। यहां की रेत लगभग सफेद रंग की है और किनारे मखमली। इस साफ-सुथरे तट पर जब डूबते सूरज की लालिमा बिखरे देखो तो जन्नत जैसा अहसास होना लाजिमी है। अपनी खूबसूरती में यह तट थाईलैंड व मलेशिया के बीचों को टक्कर देता है। समुद्र किनारे बसा और विदेशियों का पसंदीदा यह पर्यटन स्थल असल में समुद्रतल से खासी ऊंचाई पर है। वर्कला के आसपास पश्चिमी घाट की चट्टानें समुद्र से थोड़ी दूरी पर न होकर बिल्कुल किनारे पर हैं। इन्हीं में से दो चट्टानों पर बसा है वर्कला। इनमें से एक है नॉर्थ क्लिफ और दूसरी साउथ क्लिफ; और तीखी ढलान वाली इन चट्टानों की तलहटी में हैं चमचमाती रेत वाले किनारे।

कहां रुकेः वर्कला में पांच सितारा रिजॉर्ट हैं तो कम मंहगे होटल भी हैं। लेकिन यहां की असली पहचान हैं होम स्टे। विदेशी सैलानी होटलों के कमरों में बंद रहने के बजाय स्थानीय रंग-ढंग में घुलना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसे में होम स्टे की यहां भरमार है। स्थानीय लोगों के घरों में मेहमान बनकर रहना, केरल की संस्कृति को करीब से जानना और शुद्ध मलयाली भोजन… होम स्टे में रहने का अनुभव ही अलग है।

क्या करेः एक तरफ झूले, तो दूसरी तरफ चटाई पर बैठे और हंसी-ठिठोली करते युवा। पीने के लिए कुएं का पानी और मोमबत्ती की रोशनी में चारपाई पर सबके साथ बैठकर मलयाली भोजन खाना। होम स्टे में मलयाली खाने का जहां अपना ही आनंद है, वहीं क्लिफ पर मौजूद रेस्तराओं में डिनर के  विकल्प भी खुले हैं। हल्की रोशनियों के बीच बजता संगीत, नीचे गरजना करता समुद्र, और ताजा समुद्री भोजन.. आप इस माहौल में किए गए डिनर को बार-बार याद करेंगे। यहां पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर आपको बिना पका सी-फूड भी बिकता मिलेगा। आप यहां अपनी पसंद का सी-फूड पकवाकर खा सकते हैं। खाने के शौकीनों के लिए वर्कला जन्नत है। इनके अलावा, सेहत के प्रति फिक्रमंद लोग भी यहां आकर अपना तनाव दूर सकते हैं। यहां पर आयुर्वेदिक मसाज व स्पा के अनेक सेंटर हैं जहां आप अपनी शारीरिक एवं मानसिक थकान को अलविदा कह सकते हैं।

आसपासः धर्म-कर्म के लिहाज से भी वर्कला का कम महत्व नहीं है। यहां आप जनार्दन मंदिर जा सकते हैं जो दो हजार साल पुराना है। यह मंदिर पापनाशम तट से कुछ ही दूरी पर है। मान्यता है कि यहां आकर सब पापों का नाश हो जाता है। वैष्णव मत के लोग इसे दक्षिण की काशी कहते हैं। इसके अलावा, वर्कला में शिवगिरी मठ भी है जिसे महान समाज सुधाकर एवं संत नारायण गुरु ने स्थापित किया था। यहां हर साल 30 दिसंबर से 1 जनवरी तक शिवगिरी महोत्सव मनाया जाता है।

कैसे जाएः तिरुवनंतपुरम से वर्कला की दूरी करीब 50 किलोमीटर है और वहां से वर्कला के लिए बसें व ट्रेनें हैं। ट्रेन का सफर अधिक सुविधाजनक है। स्टेशन का नाम वर्कला शिवगिरी है।

 

Chandrabhagaओडिशा में चंद्रभागा

कोणार्क के विश्वप्रसिद्ध सूर्य मंदिर से महज तीन किलोमीटर दूर है चंद्रभागा का शांत व मनोरम समुद्र तट। इसकी गिनती भारत के सबसे खूबसूरत समुद्र तटों में होती है। हालांकि भीड़भाड़ व सैलानियों की रेलमपेल से दूर यह बहुत सुकून वाली जगह है। सफेद रेत, नीला समुद्र और बीच में दूर तक फैला तट। साफ आसमान में यहां सूर्योदय व सूर्यास्त दोनों ही बड़े खूबसूरत होते हैं। बताते हैं कि पहले चंद्रभागा नदी यहां आकर समुद्र में मिलती थी, इसी से इसका नाम चंद्रभागा पड़ा। हालांकि अब नदी का वो मुहाना सूखा पड़ा है। चंद्रभागा का पौराणिक संदर्भ भी मिलता है। हर साल माघ सप्तमी पर लगने वाले मेले पर यह जगह गुलजार हो जाती है। कार्तिक पूर्णिमा पर भी बड़ी संख्या में लोग यहां स्नान के लिए पहुंचते हैं। रात में अगर चांद निकला हो तो उसकी दूधिया रोशनी में इस तट पर टहलना बेहद रोमांटिक अनुभव है। हालांकि लहरें तेज होने के कारण यहां पानी में नहाना ठीक नहीं, लेकिन ऐसी मान्यता रही है कि यहां के पानी में चिकित्सकीय खूबियां हैं।

क्या करेः चंद्रभागा पर एक काम करता लाइटहाउस है, जहां से समुद्र का शानदार नजारा दिखता है। बच्चों के लिए यह खासा आकर्षक हो सकता है। इसके अलावा यहां कैमल राइड जैसे छोटे-मोटे आकर्षण बच्चों के लिए हैं। अभी यहां उस तरह की कमर्शियल गतिविधियां या वाटर स्पोर्ट्स वगैरह नहीं हैं। कोणार्क बगल में है। इसलिए सुबह-शाम बीच पर बिताना और दिन में कोणार्क के मंदिर देखना, यह यहां का सबसे प्रचलित रूटीन है। तट के किनारे भी मायादेवी मंदिर, नवग्रह मंदिर और रामचंडी मंदिर हैं।

कहां रुकेः यूनेस्को विश्व विरासत होने के कारण कोणार्क में ओडिशा पर्यटन का पंथनिवास और कुछ अन्य बड़े रिजॉर्ट व कई छोटे होटल भी हैं। चंद्रभागा बीच देखने के लिए यहीं रुकना ठीक रहेगा।

कैसे पहुंचेः चंद्रभागा का बीच पुरी से कोणार्क के रास्ते में है। दरअसल यहीं से उस तटीय रास्ते की शुरुआत होती है जिसे पुरी-कोणार्क मैरिन ड्राइव कहा जाता है। पुरी यहां से 30 किलोमीटर दूर है। वहीं सबसे निकट का रेलवे स्टेशव व बस अड्डा है। सबसे निकट का हवाई अड्डा भुवनेश्वर में है जो यहां से लगभग 75 किलोमीटर दूर है।

कब जाएः मानसून के महीने छोड़कर यहां साल में कभी भी जाया जा सकता है।

 

अंडमान में हैवलॉक का राधानगर

अंडमान व निकोबार के हैवलॉक द्वीप का बीच नंबर 7 ही राधानगर बीच भी कहलाता है। कुछ ट्रैवल विश्लेषकों ने इसे एशिया के सबसे लोकप्रिय बीचों की श्रेणी में भी रखा है। इससे इसकी खासियत का पता लग जाता है। सफेद रेत, शांत पानी और आसपास की खूबसूरती इसे आराम करने के लिए शानदार जगह बना देती है। सामने सूरज और पीछे जंगल। बीच के आसपास पक्षी और वनस्पतियां इस जगह को प्रकृति प्रेमियों के लिए भी खासी रोचक बना देती हैं। इसका नाम राधानगर पास के गांव की वजह से है। हैवलॉक पर पांच गांव हैं- गोविंद नगर, बिजॉय नगर, श्याम नगर, कृष्णा नगर और राधा नगर। हैवलॉक के उत्तर पश्चिमी तट पर एलीफेंट बीच है तो पूर्वी तट पर विजयनगर बीच और बीच नंबर 3 व 1. हैवलॉक के कई बीचों पर समुद्र के किनारे सैर करने के लिए हाथी की सवारी की जा सकती है। यहां से सूर्यास्त का नजारा बेहद अदभुत है।

क्या करेः शांत, साफ नीले पानी में नहाने का अलग ही मजा है। कई जगहों पर कोरल रीफ हैं और वहां स्नोर्कलिंग का आनंद लिया जा सकता है। बीच से थोड़ा आगे जाकर एक ब्लू लैगून भी है।

कहां रुकेः अंडमान जाने वाले सैलानियों में हैवलॉक द्वीप सबसे लोकप्रिय है, इसलिए अंडमान के कई सबसे शानदार रिजॉर्ट इस द्वीप पर हैं। या फिर आप पोर्ट ब्लेयर में रुककर भी राधानगर घूमने के लिए आ सकते हैं।

कैसे पहुंचेः पोर्ट ब्लेयर से हैवलॉक पहुंचने में फेरी से 2-4 घंटे का वक्त लगता है। रंगत व नील द्वीपों से भी फेरी यहां रोजाना आती हैं। पोर्ट ब्लेयर से हैवलॉक के लिए पहले पवनहंस के हेलीकॉप्टर भी उड़ा करते थे। अब पोर्ट ब्लेयर से एक घंटे में सेसना सी-प्लेन से भी हैवलॉक द्वीप पहुंचा जा सकता है। भारत में सी-प्लेन का आनंद केवल अंडमान में ही लिया जा सकता है। हैवलॉक पहुंचकर राधानगर जाने के लिए बस या टैक्सी ले सकते हैं। बीच पर घूमने के लिए बाइक, स्कूटर व साइकिल भी किराये पर मिल जाती हैं।

कब जाएः यहां का मौसम आम तौर पर गर्म होता है और लगभग पूरे सालभर एक जैसा रहता है। मानसून के मौसम में यहां जमकर बारिश होती है, इसलिए तब न जाएं। नवंबर से मार्च का समय यहां जाने के लिए सर्वोत्तम है।

 

गोवा का पलोलेम

दक्षिण गोवा में कोकोनट पाम के पेड़ों से घिरा, एक मील लंबा अंर्धचंद्राकर पलोलेम बीच गोवा के सबसे सुंदर समुद्र तटों में से एक माना जाता है। राजधानी पणजी से यह लगभग 75 किलोमीटर दूर है। यह रोमांच प्रेमियों और सुकून पसंद लोगों में बराबर लोकप्रिय है। यही वजह है कि इस समुद्र तट पर दोनों तरह के माहौल एक-साथ देखने को मिल जाते हैं। बीच का उत्तरी हिस्सा शांत है जहां आम तौर पर परिवार के साथ लोग समय बिताना पसंद करते हैं। लंबे समय तक रुकने वाले भी यहीं आते हैं। उत्तर वाले हिस्से में समुद्र भी शांत है और बच्चों के साथ नहाने के लिए सुरक्षित है। बीच का दक्षिणी सिरा मौज-मस्ती करने वालों को ज्यादा पसंद आता है।

क्या करेः हरकत करने का मन करे तो डॉल्फिन ट्रिप पर निकला जा सकता है। ज्वार का समय हो तो नाव लेकर नहरों में बैकवाटर्स की सैर पर निकला जा सकता है और यह ज्यादा महंगी भी नहीं। पानी उतरा हो तो बटरफ्लाई बीच पर पैदल जाया जा सकता है जो वैसे द्वीप बना रहता है। बच्चों को पास ही कोटियागा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी देखने में भी मजा आएगा, जिसे पलोलेम से दिनभर में घूमा जा सकता है।

कहां रुकेः पलोलेम अपने बीच कॉटेजेज (कोको हट्स) के लिए बहुत प्रसिद्ध है। लोकप्रिय स्पॉट होने की वजह से यहां रुकने के लिए कई शानदार होटल व रिजॉर्ट भी हर बजट के मुताबिक हैं।

कैसे पहुंचेः सबसे निकट का हवाई अड्डा डाबोलिम है। वहां से पलोलेम तक का रास्ता डेढ़ घंटे का है। पणजी से यहां आने में लगभग दो घंटे लग जाते हैं। वैसे सबसे निकट का बड़ा रेलवे स्टेशन कोंकण रेलवे की लाइन पर मडगाव (43 किलोमीटर) है। कैनाकोना रेलवे स्टेशन भी यहां से नजदीक केवल दस मिनट के रास्ते पर है।

कब जाएः बागा की ही तरह यहां भी टूरिस्ट सीजन अक्टूबर से लेकर मार्च तक होता है। क्रिसमस व नए साल की छुट्टियों में यह पीक पर होता है। जनवरी-फरवरी में तट के किनारे रातें ठंडी हो सकती हैं, वरना लगभग पूरे साल भर यहां का मौसम लगभग एक जैसा ही होता है।

 

बंगाल का मंदरमणि

Mandarmani Beachइस तट को पहले मंदरबोनि कहा जाता था जो बाद में जाकर धीरे-धीरे मंदरमणि हो गया। पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले में बंगाल की खाड़ी के ठीक शुरुआत में स्थित यह समुद्र तट बड़ी तेजी से एक बीच रिजॉर्ट के तौर पर विकसित हो रहा है। यह बीच बहुत लंबा है। कुल 13 किलोमीटर लंबा यह समुद्र तट अपने लाल केकड़ों के लिए बहुत जाना जाता है। इसे ड्राइविंग के लायक भारत के सबसे लंबे द्वीप के रूप में माना जाता है। इस द्वीप की सबसे बड़ी खूबी यही है कि टूरिस्ट नक्शे पर इतना उभरा न होने की वजह से अभी यहां लोगों का शोर-शराबा और सैलानियों की मारा-मारी उतनी नहीं है। यहां सुकून के साथ कुछ वक्त गुजारा जा सकता है।

क्या करेः पास ही में दीघा का भी बीच है। दीघा के लिए सैलानी पहले से जाते रहे हैं। दीघा की तुलना में मंदरमणि में लहरें कम ऊंची रहती हैं। पास ही में शंकरपुर भी लंबे समय से काफी लोकप्रिय सैलानी स्थल रहा है। यह भी एक वर्जिन बीच है। बीच पर बच्चों के लिए खेल के कई विकल्प हैं। नावों पर समुद्र में क्रूज के लिए निकलने का विकल्प तो है ही।

कहां रुकेः मंदरमणि में रुकने के लिए कई तरह के बजट होटल हैं। आसपास कई अच्छे बीच रिजॉर्ट भी हैं। दीघा व शंकरपुर में रुककर भी मंदरमणि को घूमा जा सकता है।

कैसे पहुंचेः यह समुद्र तट कोलकाता से दीघा के रास्ते पर कोलकाता से लगभग 180 किलोमीटर के रास्ते पर है। कोलकाता ही सबसे निकट का हवाई अड्डा है। कोलकाता से दीघा जाने वाली कई बसें चौवलखाला ले जाती हैं। वहां से मंदरमणि 14 किलोमीटर है। सबसे पास का रेलवे स्टेशन कोंटई में है जो मंदरमणि से 26 किलोमीटर है।

कब जाएः बाकी समुद्र तटों की ही तरह यह इलाका भी गर्म व उमस भरा होता है। लिहाजा मानसून में तो यहां जाना ठीक नहीं। नवंबर से मार्च तक का समय यहां जाने के लिए सबसे बेहतरीन है।

 

Tarkarliमहाराष्ट्र का तारकरली

साफ-सुथरा तट, सफेद मखमली रेत है और पारदर्शी पानी… और लोगों का हुजूम? वो बिल्कुल नहीं। बहुत कम लोग हैं जो महाराष्ट्र के कोंकण इलाके के इस बीच से वाक़िफ़ होंगे। गंदगी और भीड़ से यह आज भी अछूता है। कुडाल महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग ज़िले में है, जो कोंकण रेलवे पर है। यहां से तारकरली क़रीब 45 किलोमीटर दूर है। तारकरली के लिए रास्ता मालवण से होकर गुज़रता है। मालवण छोटा लेकिन ख़ूबसूरत क़स्बा है। मालवण से तारकरली जाने वाला रास्ता बेहद ख़ूबसूरत है। लगता है गोवा के किसी इलाक़े में घूम रहे हों। यहां पानी बिल्कुल साफ होता है। इतना पारदर्शी कि आप समुद्र के कई फुट नीचे तक देख सकते हैं। कुछ लोग इसीलिए इसे देश के सबसे ख़ूबसूरत तटों में से एक मानते हैं।

क्या करेः बच्चे स्नॉर्क्लिंग, स्कूबा डाइविंग और स्विमिंग का आनंद ले सकते हैं। पास में सिंधुदुर्ग किले की भी सैर हो सकती है और डॉल्फिन प्वायंट की भी। यहां आएं तो आम व काजू ज़रूर खरीदें। आपने अलफांसो आम का नाम सुना है न? इसका घर मालवण में ही है। आप मालवण जाकर हापुस आम मांग लीजिए.. यही अलफांसो है। रस से भरा और शाही मिठास वाला आम!! मालवण से 14 किलोमीटर दूर देवबाग है। करली नदी के मुहाने पर बसा छोटा-सा गांव जहां क़ुदरत ज़्यादा मेहरबान लगती है। चारों तरफ सिर्फ़ हरियाली है। देवबाग में बोटिंग के बिना तारकरली का मजा अधूरा है।

कहां रुकेः तारकरली बीच पर किसी रिज़ॉर्ट में ठहरें ताकि अपने प्रवास का पूरा लुत्फ़ ले सकें। महाराष्ट्र में दो हाउसबोट हैं जो तारकरली में ही हैं। हाउसबोट में ठहरने के लिए महाराष्ट्र टूरिज़्म से संपर्क कर सकते हैं। इंटरनेट पर बुकिंग करा लें तो बेहतर है।

कैसे पहुंचेः तारकरली जाने के लिए सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन कुडाल है जो कोंकण रेलवे का अहम स्टेशन है। स्टेशन से तारकरली जाने के लिए बसें तो हैं ही, ऑटो भी मिलते हैं। मालवण के लिए हर आधे घंटे में बस है। मालवण पहुंचकर तारकरली के लिए ऑटो करें तो सस्ता पड़ेगा। तारकरली यहां से सिर्फ़ 7 किलोमीटर दूर है। वैसे, तारकरली जाने के लिए कंकवली या सिंधुदुर्ग रेलवे-स्टेशन भी नज़दीक हैं, लेकिन कम ही ट्रेनें यहां रुकती हैं। इसलिए कुडाल बेहतर विकल्प है। कुडाल स्टेशन पर ऑटो-रिक्शा बहुतायत में हैं जो 350 से 400 रुपए में आपको तारकरली ले जाएंगे। हवाई-मार्ग से जाना हो तो गोवा का डेबोलिम एयरपोर्ट सबसे नज़दीक है।

कब जाएः कोंकण के हरे-भरे इलाके में होने के कारण यहां मौसम अक्सर खुशनुमा होता है। मानसून को छोड़कर यहां कभी भी जाया जा सकता है।

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कुछ खास बातें

 

बीच पर नहानाः जिन समुद्र-तटों पर लाइफ-गार्ड की व्यवस्था नहीं हो वहां पानी के खेलों के दौरान सावधानी बरतें। समुद्र तट पर किनारे पानी में जाना तो ठीक है लेकिन तैरना न आता हो तो बिना किसी सहायता के आगे गहरे पानी में जाना ठीक नहीं। लहरें ऊंची हों तो खास तौर पर ध्यान रखें। ज्यादातर हादसे तब होते हैं जब ऊंची लहर किनारे से पानी में वापस लौटती है। लौटती लहर के साथ पांव के नीचे की रेत खिसकती है और वह अक्सर संतुलन बिगाड़ सकती है। पानी में जाते समय ज्वार-भाटे का भी हमेशा ध्यान रखें। शाम ढलते-ढलते समुद्र का पानी चढ़ने लगता है, इसलिए उस समय पानी में न जाएं। बच्चों व उम्रदराज लोगों को पानी में अकेले न जाने दें। ज्यादातर टूरिस्ट बीचों पर तैरना न जानने वालों के लिए ट्यूब, लाइफ जैकेट आदि भी मिल जाते हैं।

अन्य गतिविधियाः बीच पर सैलानियों के लिए जेट स्कीइंग, पैरासेलिंग, आदि कई आकर्षण रहते हैं। ज्यादा लोकप्रिय बीचों पर ऐसे खेल कराने वालों की संख्या भी बढ़ जाती है। इसलिए जब भी खुद या बच्चों को ऐसा कोई खेल कराएं तो ऑपरेटर के उपकरण, सुरक्षा उपायों आदि की पूरी जांच-परख कर लें। सुरक्षा से किसी तरह का समझौता न करें। यही ख्याल किसी क्रूज पर समुद्र में जाते हुए भी रखें।

पिघलते सूरज में नए साल का जश्न- समंदर की लहरों में

कल आपने पढ़ा हिमालय से जुड़ी दो जगहों के बारे में। आज जानिए समुद्र से जुड़ी उन दो जगहों के बारे में जहां आप बीते साल का आखिरी सूर्यास्त या नए साल का पहला सूर्योदय देख सकते हैं-

Last sunset of the year at Kanyakumari
Last sunset of the year at Kanyakumari

कन्याकुमारी का संगम: कन्याकुमारी हमारे देश की मुख्यभूमि का आखिरी सिरा है। यहां अद्भुत समुद्री संगम है। यहां पर बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और अरब सागर मिलते हैं। इसीलिए इसकी महत्ता किसी तीर्थ से कम नहीं। अंग्रेज इसे केप कोमोरिन के नाम से जानते थे। तमिलनाडु में नागरकोइल व केरल में तिरुवनंतपुरम यहां के सबसे नजदीकी शहर हैं। देश का आखिरी सिरा होने का भाव भी इसे देशभर के सैलानियों में खासा लोकप्रिय बना देता है। लेकिन यहां की सबसे अनूठी बात यह है कि यहां आप एक ही जगह खड़े होकर पूरब से समुद्र में सूरज को उगता हुआ भी देख सकते हैं और पश्चिम में समुद्र में ही सूरज को डूबता हुआ भी देख सकते हैं। यह अद्भुत संयोग आपको देश में और कहीं नहीं मिलेगा। 31 दिसंबर की शाम इस साल को विदा कीजिए और अगले दिन तड़के वहीं जाकर नए साल की आगवानी कीजिए। कन्याकुमारी में पूरब की ही तरफ विवेकानंद रॉक भी है। सूरज की पहली किरण अक्सर इसी स्मारक के पीछे से समुद्र से बाहर निकलती देखी जा सकती है। इसीलिए हर साल 31 दिसंबर को बहुत सैलानी जुटते हैं। साल की आखिरी किरण को विदा करने और नए साल की पहली किरण का स्वागत करने के लिए। मौका मिले तो आप भी नहीं चूकिएगा अपने निकटजनों के साथ यहां जाने से।

कैसेः कन्याकुमारी के लिए दिल्ली, मुंबई व चेन्नई से ट्रेनें हैं। केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम यहां से डेढ़ घंटे के रास्ते पर है। वहीं सबसे निकट का हवाई अड्डा भी है। कन्याकुमारी छोटा ही शहर है। लेकिन वहां रुकने के लिए कई छोटे-बड़े होटल हैं। यहां समुद्र तट के निकट का फुटपाथ बाजार खरीदारी के लिए बेहद लोकप्रिय है। यहां जाने का फायदा यही है कि उत्तर भारत की सर्दी से बचा जा सकता है।

Fishermen in Chilika Lake in Odisha, India
Fishermen in Chilika Lake in Odisha, India

चिलिका का विस्तार: ओडिशा के तीन जिलों- पुरी, खुर्दा व गंजम में फैली चिलिका झील भारत का सबसे बड़ा तटीय लैगून और दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा लैगून है। इसके अलावा भारतीय उपमहाद्वीप में सर्दियों में आने वाले प्रवासी पक्षियों का सबसे बड़ा बसेरा है। कई पक्षी तो सुदूर रूस व मंगोलिया से 12 हजार किलोमीटर तक का सफर तय करके यहां पहुंचते हैं। झील दुर्लभ इरावडी डॉल्फिनों का भी घर है। बेहद खूबसूरत झील में पुरी या सातपाड़ा से नाव से जाया जा सकता है। कहने को यह झील है, लेकिन बीच झील में कई बार आपको चारों तरफ केवल समुद्र दिखाई देगा। चिलिका के सूर्योदय व सूर्यास्त, दोनों की ही बात कुछ और है। लेकिन इन दोननों का ही आनंद नाव पर झील में जाकर लिया जा सकता है। नाव पर आप अपने साथियों के साथ हों, चारों तरफ पक्षियों का कोलाहल हो और जाते साल का आखिरी या नए साल का पहला सूर्य पानी में लाल रंग भर रहा हो तो क्या नजारा होगा! जरूर सोचिएगा। यही वो समय होता है जब प्रवासी पक्षियों को चिलिका में देखा जा सकता है। इसलिए समुद्र में नलबन द्वीप की तरफ जाते हुए तड़के जल्दी नाव से निकल जाएं ताकि समुद्र के भीतर पहुंचकर सूर्योदय देख सकें और फिर शाम को लौटते हुए सूर्यास्त। यानी समुद्र के बीच जाकर समुद्र से उगते-डूबते सूरज को देखें। नए साल की इससे बेहतर शुरुआत और भला क्या होगी। इसमें बच्चों को भी खूब मजा आएगा।

कैसेः तीन जिलों में फैली चिलिका झील बहुत बड़ी है। उसमें कई जगहों से जाया जा सकता है। पुरी से कई डॉल्फिन टूर चिलिका में जाते हैं। लेकिन सबसे लोकप्रिय जगहों में से खुर्दा जिले के बालुगांव में बरकुल और गंजम जिले में रम्भा है। समुद्र में कई द्वीप हैं, जहां प्रवासी पक्षियों को देखने के लिए जाया जा सकता है। भुवनेश्वर या बरहमपुर से ट्रेन या सड़क के रास्ते बालुगांव या रम्भा जाया जा सकता है। सबसे निकट का हवाई अड्डा भुवनेश्वर ही है। ध्यान रखें कि ओडिशा का समुद्री तट होने के बावजूद तड़के या देर शाम झील में जाते समय खासी ठंड हो सकती है।

पिघलते सूरज में नए साल का जश्न- हिमालय की गोद में

View of Kangchenjunga from Tiger Hill in Darjeeling. Photo :  Carsten Nebel/Wikipedia
View of Kangchenjunga from Tiger Hill in Darjeeling. Photo : Carsten Nebel/Wikipedia

साल की आखिरी शाम को विदा करने और नए साल की पहली सुबह का स्वागत करने का ख्याल कुछ अलग ही तरीके से रोमांचित करता है। लेकिन हममें से ज्यादातर अपने आसपास की होटलों या रेस्तराओं की न्यू ईयर पार्टियों या डिनर से आगे सोच ही नहीं पाते। आखिरकार जाते साल की आखिरी शाम हमारे लिए बीते वक्त को याद करने की और नए साल की पहली सुबह नई उम्मीदें जगाने की होती है। छोडि़ए होटलों की पार्टीबाजी और नाच-गाना और इस बार अपने हमसफर, दोस्तों या निकटजनों के साथ जाइए ऐसी जगह, जहां ढलते या उगते सूरज की लालिमा आपको भीतर तक आह्लादित कर देती है। सूरज के क्षितिज में समा जाने या वहां से बाहर निकलते देखना सबसे सुकूनदायक पलों में से एक होता है। हम आपको सुझा रहे हैं ऐसी ही कुछ जगहें। इनमें से कई जगहें ऐसी हैं जहां आप एक ही स्थान पर केवल अपनी नजरें घुमाकर शाम को सूर्यास्त और सवेरे सूर्योदय देख सकते हैं। इस फेहरिस्त में हालांकि आपको गोवा, केरल या पूर्वी तट के कई समुद्री तट नहीं मिलेंगे जो पहले से ही सैलानियों में बहुत लोकप्रिय हैं।

हिमालय की गोद में

Observation deck at Tiger Hill in Darjeeling to watch sunrise
Observation deck at Tiger Hill in Darjeeling to watch sunrise. Photo:  Shanoor Habib Munmun

टाइगर हिल का रोमांचः यूं तो हिमालय में किसी भी जगह पर बर्फीले पहाड़ों के पीछे से या घाटी में फैले बादलों में से उगते सूरज को देखना बेहद रोमांचकारी अनुभव होता है। लेकिन बहुत ही कम जगहों को इसके लिए उतनी ख्याति मिलती है जितनी दार्जीलिंग में टाइगर हिल को मिली है। टाइगर हिल दार्जीलिंग शहर से 11 किलोमीटर दूर है। दार्जीलिंग से यहां या तो जीप से पहुंचा जा सकता है या फिर चौरास्ता, आलूबारी होते हुए पैदल, लेकिन इसमें दो घंटे का समय लग सकता है। टाइगर हिल से सूर्योदय देखने की ख्याति इतनी ज्यादा है कि अल्लसुबह दार्जीलिंग से हर जीप सैलानियों को लेकर टाइगर हिल की ओर दौड़ लगाती नजर आती है ताकि वहां चोटी पर बने प्लेटफॉर्म पर सूर्योदय का नजारा देखने के लिए अच्छी जगह खड़े होने को मिल सके। हैरत की बात नहीं कि देर से पहुंचने वाले सैलानियों को यहां मायूस रह जाना पड़ता है। सूरज की पहली किरण जब सामने खड़ी कंचनजंघा चोटी पर पड़ती है तो सफेद बर्फ गुलाबी रंग ले लेती है।  धीरे-धीरे यह नारंगी रंग में तब्दील हो जाती है। टाइगर हिल से मकालू पर्वत और उसकी ओट में थोड़ी छाया माउंट एवरेस्ट की भी दिखाई देती है। 1 जनवरी को बेशक थोड़ी सर्दी होगी, लेकिन टाइगर हिल से साल की पहली सुबह को प्रणाम करना एक बड़ा ही रोमांचक अनुभव होगा।

कैसेः टाइगर हिल के लिए पश्चिम बंगाल में दार्जीलिंग जाना होगा। दिल्ली या कोलकाता से ट्रेन से न्यू जलपाईगुड़ी पहुंचे या हवाई जहाज से बागडोगरा। वहां से दार्जीलिंग सड़क के रास्ते पहुंचने में चार घंटे लगते हैं। मौसम अच्छा हो तो सिलीगुड़ी से छोटी टॉय ट्रेन से भी दार्जीलिंग जाया जा सकता है। दार्जीलिंग में रुकने के हर इंतजाम हैं। टाइगर हिल जाने के लिए रात में ही होटल वाले को बता दें और टैक्सी का इंतजाम कर लें।

Sunrise View from Sonapani, Almora
Sunrise View from Sonapani, Almora

नंदा देवी का नजारा: बात सूरज के उगने या डूबने की हो तो उसकी किरणों से फैलते रंगों का जो खेल पानी में या बर्फीले पहाड़ पर देखने को मिलता है, वो कहीं और नहीं मिलता। इसीलिए सूर्योदय या सूर्यास्त देखने के सबसे लोकप्रिय स्थान या तो समुद्र (नदी व झील भी) के किनारे हैं या फिर ऊंचे पहाड़ों में। उत्तराखंड के कुमाऊं इलाके में भी ऐसी कई जगहें हैं, चाहे वो अल्मोड़ा में कसार देवी या बिनसर हो या फिर नैनीताल जिले में सोनापानी- इन जगहों से आप नंदा देवी का खूबसूरत नजारा देख सकते हैं। सोनापानी गांव पहाड़ के ढलान पर है और सामने बुरांश के पेड़ों से लकदक दूर तक फैली घाटी है। घाटी के उस पार हिमालय की श्रृंखलाएं इस तरह ऊंची सामने खड़ी हैं, मानो यकायक कोई ऊंची दीवार सामने आ जाए। इन्हीं में भारत की दूसरी सबसे ऊंची चोटी नंदा देवी भी है। यहां आपको पर्वत के पीछे से उगता सूरज तो नजर नहीं आएगा, लेकिन खुले मौसम में सुबह की पहली किरण में नंदा देवी और बाकी चोटियों के बदलते रंगों में आप खो जाएंगे। कमोबेश ऐसी ही रंगत डूबते सूरज के समय भी रहेगी। दिसंबर-जनवरी में आप सामने के पहाड़ों की ठंडक महसूस कर सकेंगे, हो सकता है कि कभी बर्फबारी से भी दो-चार हो जाएं, लेकिन रूमानियत भरपूर रहेगी। सर्दी से डर न लगता हो और हनीमून व नया साल, दोनों साथ मनाना चाहें तो इससे बेहतर जगह कोई नहीं। बाकी दुनिया के हो-हल्ले से बहुत दूर- थोड़ा रोमांच और पूरा रोमांस। एक नई शुरुआत के लिए एकदम माफिक जगह है यह।

कैसेः सोनापानी जाने के लिए ट्रेन से काठगोदाम पहुंचकर या हवाई जहाज से पंतनगर पहुंचकर टैक्सी करनी होगी। वहां से सड़क का रास्ता लगभग चार घंटे का है। सोनापानी रिजॉर्ट में शानदार कॉटेज हैं, करने व घूमने को बहुत कुछ है और कुछ न करना चाहें तो भी यहां बोर नहीं होंगे। संगीत सुनाती मदमस्त पहाड़ी हवा है और गीत गाते पंछी। अल्मोड़ा व मुक्तेश्वर जैसे सैलानी स्थल भी निकट ही हैं।

 

पन्ना टाइगर रिजर्वः हीरा है सदा के लिए

Jungles of Panna
Jungles of Panna

पन्ना एक समय अपने हीरों और संपन्न वन्य संपदा के लिए जाना जाता था। दोनों ही लिहाज से वहां नाटकीय रूप से गिरावट आई। लेकिन उसके बावजूद पन्ना नेशनल पार्क व टाइगर रिजर्व मध्य प्रदेश में बाघों को देखने के लिए सबसे खूबसूरत प्राकृतिक माहौल है। विशाल केन नदी के साये में, घाटियों, पठारों, घास के मैदानों व खाइयों से पटा पन्ना पार्क वाकई बाघ देखने के लिए सबसे उम्दा जगह है। केन नदी के बहाव के साथ मिलने वाली खाइयां और झरने बेहद रोमांचक हैं। साथ ही पन्ना देश में बाघों के संरक्षण के लिए एक बड़ी चुनौती भी रहा। कई मुश्किलों का सामना करने के बाद आज उसका गौरव फिर से बहाल है। पन्ना में गोंडवाना काल के कई चिह्न भी मिलते हैं। टाइगर रिजर्व के अलावा पन्ना को पांडव फॉल्स, केन घड़ियाल अभयारण्य और रानेह फॉल्स के लिए भी खूब सैलानी मिलते हैं।

Always on alert for predators
Always on alert for predators

जंगल व वन्य प्राणीः कुल 543 वर्ग किलोमीटर इलाके में केन नदी के दोनों और फैला पन्ना नेशनल पार्क साल व टीक के घने जंगलों से लकदक है। पार्क के इलाके में तत्कालीन पन्ना व छतरपुर रियासतों की आरक्षित शिकारगाहें शामिल हैं। ये जंगल कई वन्य प्राणियों को संरक्षण देते हैं। बाघ के अलावा, तेंदुआ, लोमड़ी व घड़ियाल यां के प्रमुख आकर्षण हैं। चिंकारा व सांभर हिरणों के झुंड तो जहां-तहां दिखाई देते ही रहते हैं। जंगली सूअर, भालू, चीतल, चौसिंघा, साही आदि भी देखे जा सकते हैं। यहां कई तरह  के पक्षी और वनस्पति भी हैं जिनसे यहां का पूरा माहौल बेहद रोमांचक बन जाता है।

Safariसफारीः पार्क में घूमने के दो तरीके हैं- चौपहिया वाहन से या हाथी की पीठ पर। पार्क के जंगली जानवर दोनों ही तरह की सफारी के अभ्यस्त हो चुके हैं, फिर भी जंगल का कायदा तो यही कहता है कि जंगल में शांत व होशियार रहें और धीमे-धीमे चलें। जीप सफारी आम तौर पर सवेरे सूर्योदय से लेकर 10 बजे तक और फिर शाम 4 बजे से सूर्यास्त तक की जाती हैं। सूर्योदय व सूर्यास्त का समय जंगली जानवरों को देखने के लिए सबसे बढ़िया माना जाता है। जानवर सबसे ज्यादा सक्रिय उसी समय होते हैं। वन विभाग टाइगरों की निगरानी के लिए हाथी का इस्तेमाल करता है। अगर टाइगर की स्पॉटिंग होती है जो हाथी से आप सीधे उसी जगह पर जा सकते हैं।

Ken river is the lifeline of Panna national park
Ken river is the lifeline of Panna national park

कैसे पहुंचे

वायु मार्ग

खजुराहो (25 किलोमीटर) सबसे निकट का हवाई अड्डा है, जहां के लिए दिल्ली व आगरा से सीधी उड़ानें हैं।

ट्रेन से

खजुराहो में अब रेलवे स्टेशन भी है। दिल्ली या मुंबई से महोबा और वहां से डेढ़ घंटे में खजुराहो पहुंचा जा सकता है। इसके अलावा झांसी रेलवे स्टेशन यहां से 180 किलोमीटर और सतना 90 व कटनी 150 किलोमीटर दूर है।

कब जाएं

यहां जाने के लिए दिसंबर से मार्च का समय सबसे बेहतरीन है।