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आवारासफरIndia

किसी नई सैरगाह पर इस बार

Upendra SwamiApril 5, 2014 1912 Views0

इम्तिहान खत्म और गर्मियों की छुट्टियों का मौसम शुरू। घूमने और अपने भीतर के सैलानी को बाहर निकालने का बहुप्रतीक्षित समय। लेकिन इस बार अपनी उसी पुरानी लिस्ट को किनारे रखें- शिमला, कुल्लू-मनाली, देहरादून-मसूरी, दार्जीलिंग, श्रीनगर, ऊटी, नैनीताल से आगे के विकल्प सोचें। ये सारी जगहें खूबसूरत हैं लेकिन सैलानियों की भीड़ से भरी हैं। यहां के बाजारों में रैला ज्यादा होता है और सुकून कम।इसलिए ऐसी जगहें चुनें जो खूबसूरत तो हों लेकिन जहां टूरिस्टों की मारा-मारी कम हो। जहां सुकून हो और वो पसंद व जेब के अनुकूल भी हों। ऐसी ही कुछ जगहों के बारे में-

बिनसरः सफेद चोटियों का बेमिसाल नजारा

Binsarकुमाऊं के हिमालयी इलाके के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक है बिनसर। नैनीताल से महज 95 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस जगह की ऊंचाई समुद्र तल से 2420 मीटर है। हिमालय का जो नजारा यहां से देखने को मिलता है, वह शायद कुमाऊं में कहीं और से नहीं मिलेगा। सामने फैली वादी और उसके उस पार बाएं से दाएं नजरें घुमाओ तो एक के बाद एक हिमालय की चोटियो को नयनाभिराम, अबाधित दृश्य। चौखंबा से शुरू होकर त्रिशूल, नंदा देवी, नंदा कोट, शिवलिंग और पंचाचूली की पांच चोटियों की अविराम श्रृंखला आपका मन मोह लेती है। और अगर मौसम खुला हो और धूप निकली हो तो आप यहां से बद्रीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री तक को निहार सकते हैं।

सवेरे सूरज की पहली किरण से लेकर सूर्यास्त तक इन चोटियों के बदलते रंग आपको इन्हें अपलक निहारने के लिए मजबूर कर देंगे। यहां से मन न भरे तो आप थोड़ा और ऊपर जाकर बिनसर हिल या झंडी धार से अपने नजारे को और विस्तार दे सकते हैं। बिनसर ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए भी स्वर्ग है। चीड़ व बुरांश के जंगलों से लदी पहाडि़यों में कई पहाड़ी रास्ते निकलते हैं। जंगल का यह इलाका बिनसर वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के तहत आता है। इस अभयारण्य में कई दुर्लभ जानवर, पक्षी, तितलियां और जंगली फूल देखने को मिल जाते हैं।

बिनसर से अल्मोड़ा लगभग तीस किलोमीटर दूर है। यहां से 35 किलोमीटर दूर जागेश्वर के प्रसिद्ध मंदिर हैं। बिनसर के नजदीक गणनाथ मंदिर भी है। यहा खली एस्टेट भी देखा जा सकता है जहां कभी यहां के तत्कालीन राजाओं का महल हुआ करता था।

कैसे पहुंचे: बिनसर के लिए सबसे नजदीक का रेलवे स्टेशन काठगोदाम है। वहां से अल्मोड़ा के रास्ते या नैनीताल के रास्ते सड़क मार्ग से बिनसर आया जा सकता है। काठगोदाम के लिए दिल्ली व लखनऊ से ट्रेनें हैं। सबसे निकट का हवाई अड्डा पंतनगर है।

कहां ठहरें: बिनसर में कई छोटे होटल, रिजॉर्ट व सस्ते लॉज हैं। कुमाऊं मंडल विकास निगम के भी खूबसूरत कॉटेज हैं। यहां सीजन में हजार रुपये रोजाना से लेकर सात-आठ हजार रुपये रोजाना तक के किराये पर कमरे मिल जाएंगे। कॉटेज ऐसा हो जहां कमरे की बॉल्कनी से हिमालय का नजारा मिलता हो तो क्या बात है।

कब जाएं: अप्रैल से जून और फिर सितंबर से नवंबर का समय यहां के लिए सबसे बेहतरीन है क्योंकि तब आसमान साफ होता है। नीले आसमान में हिमालय का नजारा बेहद आकर्षक होता है। सर्दियों में जाएं तो बर्फ का लुत्फ ले सकते हैं। बारिश के समय पहाड़ के तमाम रास्तों की ही तरह वहां के रास्ते जोखिम भरे हो जाते हैं।

 

पहलगामः जन्नत का एक हिस्सा यह भी

Pahalgamहममें से ज्यादातर पहलगाम को अमरनाथ यात्रा के बेस के तौर पर जानते हैं, लेकिन उसके अलावा भी पहलगाम कश्मीर घाटी की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है। पहलगाम यानी चरवाहों की घाटी। लिद्दर नदी के दोनों ओर की घाटी सत्तर व अस्सी के दशकों में बॉलीवुड का सबसे लोकप्रिय शूटिंग स्थल हुआ करती थी। यहां एक तो बॉबी हट है जिसमें ऋषि कपूर-डिंपल कपाड़िया की सुपर हिट फिल्म ‘बॉबी’ की शूटिंग हुई थी, तो एक बेताब घाटी है, जहां सन्नी देओल की पहली फिल्म ‘बेताब’ की शूटिंग हुई थी। कुछ रोमांटिक पल बिताने हों या सुकून के लम्हे… पहलगाम मन मोहने वाला है। घाटी, नदी और चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे बर्फीले पहाड़। रोमांच प्रेमियों के लिए ट्रैकिंग व राफ्टिंग के भी मौके हैं। लिद्दर नदी में अब खूब राफ्टिंग होने लगी है। उधर दो-तीन दिन के कई बड़े खूबसूरत ट्रैक भी हैं। आसपास के इलाके में घोड़े व खच्चर पर घूमने का भी अलग ही मजा है।

कैसे पहुंचे: पहलगाम कश्मीर के अनंतनाग जिले में है। पहलगाम पहुंचने का एकमात्र रास्ता सडक़ के जरिये है। अगर आप जम्मू से आ रहे हैं तो श्रीनगर से 45 किलोमीटर पहले खन्नाबल से पहलगाम की तरफ मुड़ सकते हैं। अगर हवाई जहाज से श्रीनगर आ रहे हैं तो वहां से बिजबेहड़ा के रास्ते पहलगाम लगभग 95 किलोमीटर पड़ता है। सडक़ से यह सफर दो-तीन घंटे में तय किया जा सकता है। अमरनाथ के रास्ते में चंदनवाड़ी पहलगाम से 16 किलोमीटर आगे है। अनंतनाग में ही कश्मीर घाटी की ट्रेन (बनिहाल-बारामुला) का रेलवे स्टेशन भी है।

कहां ठहरें: पहलगाम में कई छोटे होटल, रिजॉर्ट व सस्ते लॉज हैं। जेकेटीडीसी के भी कॉटेज हैं। यहां सीजन में हजार रुपये रोजाना से लेकर सात-आठ हजार रुपये रोजाना तक के किराये पर कमरे मिल जाएंगे। लिद्दर नदी के किनारे किसी कॉटेज से नजारा ही अलग होता है।

कब जाएं: अप्रैल से जून और अक्टूबर-नवंबर का समय जाने के लिए सबसे बेहतर। बारिश और सर्दियों के महीने में टूरिस्टों की भीड़ कम रहती है। सर्दियां बेहद ठंडी और बर्फीली होती हैं, लेकिन तब आप स्कीइंग का मजा ले सकते हैं। जून में तो अमरनाथ यत्रियों की आवाजाही शुरू हो जाती है इसलिए वहां भीड़ भी हो जाती है और चीजें महंगी भी हो जाती हैं। लेकिन अप्रैल-मई में वहां हर लिहाज से सुकून होता है।

 

तवांगः पूर्वोत्तर में जन्नत

tawangहाल के सालों में अरुणाचल प्रदेश का यह हिल स्टेशन खासा चर्चा में रहा है। जितना भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के चलते, उतना ही एक नए पर्यटन आकर्षण के तौर पर। तवांग पूर्वोत्तर भारत की सात बहनों की सबसे खास पहचान के तौर पर सामने उभरा है। मन मोहने वाली अछूती प्राकृतिक खूबसूरती। तवांग की सबसे ज्यादा लोकप्रियता वहां की बौद्ध मोनेस्ट्री के लिए है जो भारत की सबसे बड़ी मोनेस्ट्रियों में से एक है। इसका निर्माण 350 साल पहले 5वें दलाई लामा की देखरेख में हुआ था। मोम्पा जनजाति का बसेरा तवांग इलाका एक अलग ही सांस्कृतिक पहचान रखता है। छठे दलाई लामा का जन्म इसी जनजाति में हुआ था। यहां का हैंडीक्राफ्ट बेहद मशहूर है और उतना ही मशहूर है सेला टॉप पास जहां लगभग पूरे सालभर बर्फ रहती है। तेजपुर से तवांग के रास्ते में ही जसवंतगढ़ है। तवांग के आसपास देखने के लिए बर्फीली चोटियां हैं, झीलें हैं, झरने हैं। एडवेंचर टूरिज्म के नए गढ़ के रूप में उदय। ट्रैकिंग के कई नए रास्ते रोमांचप्रेमियों को लुभा रहे हैं। वहां तक पहुंचने का सफर लंबा और थकाऊ हो सकता है लेकिन एक बार पहुंचते ही यहां की खूबसूरती देखकर सारी थकान छूमंतर हो जाती है। तवांग को संस्कृतियों का मिलनबिंदु भी कहा जाता है। तवांग के रास्ते ही 1962 में चीन ने भारत पर हमला किया था। उस लड़ाई में मारे गए भारतीय सैनिकों की याद में वहां एक स्मारक भी बना हुआ है।

कैसे पहुंचे: ट्रेन से या हवाई जहाज से असम में गुवाहाटी या तेजपुर पहुंचे। तवांग का रास्ता गुवाहाटी से 13 घंटे और तेजपुर से 10 घंटे का है। वैसे तवांग के लिए गुवाहाटी से रोजाना और अरुणाचल की राजधानी इटानगर से हफ्ते में दो बार उड़ान भी है। सड़क के रास्ते जाएं तो भालुकपोंग में परमिट की जांच होती है। सीमावर्ती व संवेदनशील राज्य होने के कारण अरुणाचल के कुछ इलाकों में जाने के लिए इनर लाइन परमिट की जरूरत होती है।

कहां ठहरें: तवांग में सरकारी टूरिस्ट लॉज और फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में रुकने की किफायती सुविधा है। बीस से ज्यादा निजी होटल भी हैं जिनमें तीन सौ रुपये से लेकर ढाई हजार रुपये रोजाना तक रुका जा सकता है।

कब जाएं: सबसे बढिय़ा समय अप्रैल से अक्टूबर, लेकिन मई-जून के महीने खासी बारिश वाले हो सकते हैं। वैसे वहां पूरे सालभर जाया जा सकता है। सर्दियों में रातों का तापमान शून्य से नीचे चला जाता है।

 

लाचुंगः सबसे खूबसूरत गांव

Lachungअपने चमत्कृत कर देने वाली खूबसूरती के लिए इसे कई लोग सबसे सुंदर गांव भी कहते हैं। उत्तर सिक्किम में साढ़े आठ हजार फुट से भी ज्यादा ऊंचाई पर लाचुंग चू नदी के किनारे बसा यह गांव बर्फीली चोटियों, शानदार झरनों, नदियों और सेब के बगीचों की वजह से सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। इतनी ऊंचाई पर ठंड तो बारहमासी होती है। लेकिन बर्फ गिरी हो तो यहां की खूबसूरती को नया ही आयाम मिल जाता है… जिसकी फोटो उतारकर आप अपने ड्राइंगरूम में सजा सकते हैं। इसीलिए लोग यहां सरदी के मौसम में भी खूब आते हैं। प्राकृतिक खूबसूरती के अलावा सिक्किम की खास बात यह भी है कि बर्फ गिरने पर भी उत्तर का यह इलाका उतना ही सुगम रहता है। पहुंच आसान हो तो घूमने का मजा ही मजा। बर्फ से ढकी चोटियां, झरने और चांदी सी झिलमिलाती नदियां यहां आने वाले सैलानियों को स्तब्ध कर देती हैं। लाचुंग ऐसी ही जगह है। आम तौर पर लाचुंग को युमथांग घाटी के लिए बेस के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। युमथांग घाटी को पूरब का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है। सेब के अलावा यहां के आड़ू व आलुबुखारे भी बहुत प्रसिद्ध हैं। इसकी अहमियत इसलिए भी है कि लाचुंग शिंग्बा रोडोडेंड्रन (बुरांश) सैंक्चुअरी और युमथांग घाटी का प्रवेश द्वार है। शिंग्बा सैंक्चुअरी में इतने रंगों के बुरांश हैं, जितने आपने देखे-सुने न होंगे। इसी तरह 12 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित युमथांग को फूलों की घाटी कहा जाता है। लाचुंग में एक सवा सौ साल पुराना गोम्पा भी है, जो बौद्ध उत्सवों के आयोजन का केंद्र है। यहां की खास संस्कृति और स्वशासन की पंचायत जुम्सा भी बेहद चर्चित है। इसलिए इस बार सिक्किम जाएं तो गंगटोक न रुकें, सुदूर उत्तर में लाचुंग तक जाएं।

कैसे पहुंचे: लाचुंग उत्तर में सिक्किम का आखिरी गांव है, राजधानी गंगटोक से लाचुंग 115 किलोमीटर दूर है। लगभग मंगन और चुंगथांग होते हुए खूबसूरत पहाड़ी सडक़ रास्ता लाचुंग जाता है। गंगटोक पहुंचने के लिए या तो बागडोगरा तक हवाई जहाज से या ट्रेन से जलपाईगुड़ी पहुंचे। वहां से गंगटोक के लिए टैक्सी या बस लें। गंगटोक से लाचुंग के लिए बसें व टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं।

कहां ठहरें: लाचुंग में बहुत ज्यादा सैलानी नहीं पहुंचते। ठहरने के लिए आम तौर पर सस्ते व अच्छे होटल मिल जाते हैं। रुकने के लिए एक डाक बंगला भी है।

कब जाएं: अप्रैल से जून तक का समय शिंग्बा और युमथांग में फूलों के खिलने के लिए सबसे अनुकूल है। इस समय यहां की छटा देखते ही बनती है। जितना जल्दी जाएं, बेहतर। लाचुंग से युमथांग घाटी 24 किलोमीटर आगे है। युमथांग तक जीपें जाती हैं।

 

कूर्गः प्रकृति का चरम सुख

Coorgकुछ लोग कूर्ग को भी भारत का स्कॉटलैंड कहते हैं। पश्चिमी घाट में कर्नाटक दक्षिण-पश्चिमी सिरे पर कावेरी नदी की धाराओं से भरी-पूरी ब्रह्मïगिरि पहाडिय़ों में स्थित है कूर्ग। यह जिक्र पहले भी आया है कि केरल में मुन्नार से लेकर कूर्ग तक के रास्ते को दुनिया के सबसे खूबसूरत राइडिंग रास्तों में शुमार किया जाता है। पूरा इलाका चाय, कॉफी, इलायची व अन्य मसालों के बागानों से समृद्ध है। बहुत लोगों को नहीं पता होगा कि कूर्ग में भारत में तिब्बतियों की सबसे बड़ी बस्ती बायलाकुपे में है। यहां की नामद्रोलिंग मोनेस्ट्री में 40 फुट ऊंची बौद्ध प्रतिमाएं देखने को मिल जाएंगी। कुर्ग में इतिहास की झलक लेने के लिए किला, प्रकृति को निहारने के लिए झरने और रोमांच का मजा लेने के लिए ट्रैकिंग के मौके हैं। पहाडिय़ों, बादलों और धुंध के बीच सिमटे कूर्ग का दृश्य देखकर आपका मन बाग-बाग हो जाएगा। कुर्ग को कोडागु भी कहा जाता है और यह दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कॉफी में से एक के लिए माना जाता है। इसके एक तरफ कर्नाटक का मैसूर जिला है तो दूसरी तरफ केरल का वायनाड जिला। कोडागु जिले में तीन वन्यप्राणी अभयारण्य और एक नेशनल पार्क स्थित है। मडिकेरी के अलावा कूर्ग के मुख्य इलाके हैं विराजपेट, सोमवारपेट और कुशलनगर। मडिकेरी में ऐतिहासिक महत्व की कई जगहें हैं और मडिकेरी किला उनमें से एक है। मुद्दुराजा ने इस किले का निर्माण करवाया था, जिसे बाद में टीपू सुल्तान ने फिर बनवाया। किले में एक पुरानी जेल, गिरिजाघर और मंदिर भी है।

कैसे पहुंचे: कूर्ग जिले का मुख्यालय मदिकेरी में है। यहां के लिए सबसे नजदीकी हवाईअड्डा मैंगलोर है। मैंगलौर से बस में मडिकेरी पहुंचने में साढ़े 4 घंटे  लगते हैं, करीब इतना ही वक्त मैसूर से मडिकेरी पहुंचने में लगता है। बैंगलोर, मैसूर व कालीकट से भी मदिकेरी के लिए बसें व टैक्सियां हैं। ट्रेन से आप मैसूर या थालेसरी तक जा सकते हैं।

कहां ठहरें: मदिकेरी में फाइव स्टार रिजॉर्ट से लेकर सस्ते होटल तक, सब उपलब्ध हैं। अपने बजट के हिसाब से आप होटलों का चुनाव कर सकते हैं। अगर आप कूर्ग जाएं तो किसी होटल में ठहरने की बजाए होम-स्टे को तरजीह दें। यह बहुत अच्छा विकल्प है। भीड-भड़क्के और शोर-शराबे से दूर, प्रकृति की गोद में, एक घर में सुकून से वक्त बिताना किसे अच्छा नहीं लगता? खासतौर से जब उस घर में लजीज खाने के साथ-साथ तमाम सुविधाएं भी मिलें।

कब जाएं: जून से अगस्त तक के महीने यहां भारी मानसूनी बारिश के होते हैं। जुलाई से सितंबर के महीनों में यहां के झरनों का भरपूर आनंद लिया जा सकता है। मई के शुरुआत तक यहां मौसम सुहाना बना रहता है। अप्रैल व मई में समूचा इलाका कॉफी की महक से गमकता रहता है।

 

मिरिकः झील के उस पार

Mirikअबकी बार गर्मियों की छुट्टियां मनाने के लिए दार्जीलिंग का नाम जेहन में आए तो बजाय वहां के मिरिक का रुख कर लें। सुमेंदु झील के चारों ओर बसा मिरिक खूबसूरत है, शांत है और दार्जीलिंग की तुलना में ज्यादा पास है। दार्जीलिंग की ही तरह मिरिक का भी कुछ हिस्सा अंग्रेजों द्वारा ही बसाया गया है। सुमेंदु झील के चारों ओर टहलते हुए, दूर क्षितिज में कंचनजंगा को निहारते हुए बड़ी सुखद अनुभूति होती है। सुमेंदु झील के चारों ओर का यह रास्ता लगभग साढ़े तीन किलोमीटर का है। आसपास चाय के बागान भी मिरिक को दार्जीलिंग जैसी अनुभूति देते हैं। मिरिक अपने ऑरेंज व ऑर्किड, दोनों के लिए जाना जाता है। इसके अलावा मिरिक में बोकर मोनेस्ट्री है, टिंगलिंग व्यू प्वाइंट है और कंचनजंगा पर उगते सूरज की आभा देखने के लिए सनराइज प्वाइंट है। कहा जाता है कि मिरिक शब्द लेपचा शब्दों मिर-योक से बना है, जिनका अर्थ है आग से जली जगह। पिछले तीस सालों में यहां हुए टूरिज्म के विकास के चलते अब झील की दूसरी तरफ कृष्णानगर बस गया है जहां नए होटल व रिजॉर्ट बन गए हैं। मिरिक चर्च दार्जीलिंग जिले की सबसे बड़ी चर्च मानी जाती है। मिरिक के सबसे ऊंचे प्वॉइंट पर स्विस कॉटेज है।

कैसे पहुंचे: मिरिक सिलीगुड़ी से 52 किलोमीटर दूर हों। यहां से दार्जीलिंग 49 किलोमीटर है। सबसे निकट का रेलवे स्टेशन दिल्ली-गुवाहाटी रेलवे लाइन पर न्यू जलपाईगुड़ी है। सबसे निकट का हवाई अड्डा बागडोगरा है, जो मिरिक से 52 किलोमीटर दूर है। सिलीगुड़ी व दार्जीलिंग से मिरिक के लिए टैक्सी मिल जाती हैं।

कहां ठहरें: मिरिक में ज्यादातर होटलें कृष्णानगर इलाके में हैं। कई लॉज व गेस्ट हाउस भी हैं। वन विभाग का भी एक खूबसूरत रेस्ट हाउस है और हैलीपेड के निकट एक होटल हिल काउंसिल का भी है।

कब जाएं: मिरिक देश के उस हिस्से में है जहां आम तौर पर बहुत ज्यादा गर्मी नहीं पड़ती। यहां लगभग पूरे सालभर मौसम खुशनुमा रहता है। सर्दियां बेहद ठंडी होती हैं। वैसे मार्च से मई और सितंबर से नवंबर का समय सर्वश्रेष्ठ है।

 

कांगड़ाः प्रकृति व संस्कृति

Kangraकांगड़ा घाटी निचले हिमालयी इलाकों की सबसे सुंदर घाटियों में से एक है। सामने नीले आसमान में चमकती धौलाधार श्रृंखलाओं की बर्फीली चोटियां, बगल में पीले सरसों के खेत और उनके बीच से छोटी लाइन की ट्रेन का छुक-छुक सफर… कांगड़ा घाटी की यह छवि बेहद लुभावनी है। कांगड़ा में प्रकृति और संस्कृति, दोनों की विविधता जबरदस्त है। धर्मशाला की ओर फिजा में बौद्ध धर्म है तो कांगड़ा की तरफ ब्रजेश्वरी देवी, चामुंडा देवी, बैजनाथ, ज्वालाजी जैसे हिंदू मंदिर हैं। ब्रजेश्वरी देवी को नगरकोट कांगड़े वाली माता भी कहा जाता है। कांगड़ा का इतिहास साढ़े तीन हजार साल पुराना बतलाया जाता है। कांगड़ा शहर से तीन किलोमीटर दूर स्थित कांगड़ा फोर्ट भी इतिहास की कई दास्तानें अपने में समेटे हुए है। इसे नगरकोट भी कहा जाता है। कांगड़ा फोर्ट एक समय पंजाब के पहाड़ी इलाकों पर शासन करने वाले कटोच राजाओं की राजधानी हुआ करता था। कांगड़ा घाटी के बीड़ व बिलिंग स्थान साहसिक खेलों से जुड़े हैं।

कैसे पहुंचे: कांगड़ा शहर धर्मशाला से 17 किलोमीटर, शिमला से 220 किलोमीटर और चंडीगढ़ से 235 किलोमीटर दूर है। धर्मशाला ही सबसे निकट का हवाईअड्डा है। ट्रेन से पठानकोट आकर कांगड़ा के लिए टैक्सी या बसें ली जा सकती हैं या फिर वहां से जोगिंदरनगर के लिए जाने वाली छोटी लाइन की गाड़ी से कांगड़ा जाया जा सकता है।

कहां ठहरें: कांगड़ा में रुकने के लिए बजट होटलों के अलावा कई किफायती होमस्टे विकल्प भी उपलब्ध हैं। कुछ महंगे रिजॉर्ट भी हैं। कांगड़ा के अलावा बैजनाथ, पालमपुर आदि स्थानों पर भी रुका जा सकता है। पालमपुर को आधार बनाकर सैलानी कांगड़ा घाटी के कई दर्शनीय स्थल सरलता से देख सकते हैं। प्रसिद्ध ऐतिहासिक बैजनाथ मंदिर पालमपुर से मात्र 18 किमी. दूर है। लगभग 1200 वर्ष प्राचीन यह मंदिर वास्तुशिल्प व पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

कब जाएं: जुलाई से सितंबर के महीने भारी बारिश वाले होते हैं। उन दिनों घूमने का लुत्फ नहीं लिया जा सकता। अप्रैल-मई और फिर अक्टूबर-नवंबर के महीने ज्यादा खुशनुमा होते हैं जब हिमालय के खुले नजारे मिल सकते हैं और मौसम ऐसा कि ज्यादा परेशानी भी न हो।

 

माथेरानः हिल स्टेशनों में अनूठा

Matheranपश्चिमी घाट में महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित माथेरान हिल स्टेशन दुनिया में उन गिनी-चुनी जगहों में से एक है जहां किसी भी किस्म के मोटर वाहन के जाने पर पूरी तरह पाबंदी है। माथेरान भारत का सबसे छोटा हिल स्टेशन भी माना जाता है। वाहनों का अभाव इसे बेहद शांत बना देता है और यही बाकी जगहों की तुलना में इसे थोड़ा खास बना देता है। कल्पना कीजिए ऐसी जगह की जहां कोई कार-स्कूटर-बस न हो। मानो आप थोड़ा अतीत में चले गए हों, जहां केवल घोड़े-खच्चर हों और हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा। दस्तूरी नाका से आगे वाहनों के जाने पर पाबंदी है। माथेरान में बंदरों की खासी आबादी है और औषधीय वनस्पतियां भी खूब हैं। माथेरान में 28 व्यू प्वाइंट, दो झीलें, दो पार्क हैं। सारे व्यू प्वाइंट का मजा लेने के लिए दो-तीन का समय लग जाता है। एलेक्जेंडर प्वाइंट, आर्टिरट प्वाइंट, रामबाग प्वाइंट, लिटिल चौक प्वाइंट, हनीमून प्वाइंट, वन ट्री हिल प्वाइंट, ओलंपिया रेसकोर्स, लॉर्डस प्वाइंट, हार्ट प्वाइंट, माउंट बेरी प्वाइंट, सेसिल प्वाइंट, पनोरमा प्वाइंट, स्पॉट लुईस प्वाइंट, इको प्वाइंट, नवरोजी लार्ड गार्डन आदि हैं। इसके अलावा माउंट बेरी और शार्लोट लेक भी यहां के मुख्य आकर्षण हैं। हनीमून पॉइंट पर रस्सी से घाटी को पार करने के लिए पर्यटक दूर-दूर से आते हैं। पेनोरमा प्वायंट से उगते हुए सूरज का ख़ूबसूरत नज़ारा है तो सनसेट प्वायंट पर सुदूर पहाडिय़ों के बीच गुम होता सूरज भी। शार्लोट लेक से पूरे माथेरान में पानी की सप्लाई होती है। झील के आस-पास का इलाका सुकून भरा है। कुछ दूर पिसरनाथ मंदिर है। लॉर्ड्स प्वायंट भी नजदीकहै। यहां से आप सहयाद्रि पर्वत श्रृंखला से घिरा माथेरान देख सकते हैं। गौर से देखने पर प्रबलगढ़ किला भी नजर आता है। माथेरान कई तरह के जीवजंतुओं का भी बसेरा है।

कैसे पहुंचे: माथेरान मुंबई से सौ किलोमीटर और पुणे से 120 किलोमीटर दूर है। यही दोनों सबसे पास के हवाई अड्डे हैं। पुणे-मुंबई रेल लाइन पर नेरल स्टेशन से माथेरान के लिए छोटी लाइन की गाड़ी चलती है। 2007 में इस गाड़ी ने सौ साल पूरे कर लिए।

कहां ठहरें: माथेरान में चूंकि मुंबई व पुणे से सैलानियों की आवक बहुत ज्यादा है, इसलिए वहां बड़ी संख्या में हर बजट के अनुकूल रिजॉर्ट, होटल व कॉटेज हैं।

कब जाएं: जून से अगस्त तक का समय छोडक़र माथेरान साल में कभी जाया जा सकता है। अप्रैल-मई में वहां की ठंडी आबो-हवा का मजा लिया जा सकता है तो मानसून के बाद के समय में वहां की हरियाली का। तब वहां के सारे झरने व झीलें भी लबालब हो जाते हैं।

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