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परंपराएं जोड़ती व तोड़ती नंदा राजजात यात्रा

Nanda at Homkund. Photo : Jaimitra Bisht
Nanda at Homkund. Photo : Jaimitra Bisht

नंदा होमकुंड से कैलाश के लिए विदा हो गईं- रास्ते के तमाम कष्टों व तकलीफों को झेलते हुए। लेकिन नंदा को पहुंचाने होमकुंड या शिलासमुद्र तक गए यात्रियों के लिए नंदा को छोड़कर लौटने के बाद का रास्ता ज्यादा तकलीफदेह था। भला किसने कहा था कि चढ़ने की तुलना में पहाड़ से उतरना आसान होता है! चंदनिया घाट से लाटा खोपड़ी और फिर वहां से सुतौल तक की जो उतराई थी, वैसी विकट उतराई ट्रैकिंग के बीस साल से ज्यादा के अपने अनुभव में मैंने कम ही देखी-सुनी हैं। मुश्किल यह थी कि इसका किसी को अंदाजा भी न था। डर सब रहे थे ज्यूंरागली को लेकर और हालत पतली हुई नीचे उतर कर।

Yatris on hilly terrain
Yatris on hilly terrain

ज्यूंरागली का अर्थ स्थानीय भाषा में मौत की गली होता है। रूपकुंड की तरफ से चढ़कर शिला समुद्र की ओर उतरने का यहां जो संकरा रास्ता है, ऊपर धार (दर्रे) पर मौसम का जो पल-पल बदलता विकट रुख है, उन सबको ध्यान में रखकर इसका यह नाम कोई हैरत नहीं देता। फिर रूपकुंड में बिखरे नरकंकालों के बारे में तो कहा ही जाता है कि वे सदियों पहले ज्यूंरागली पार कर रहे किसी सैन्य बल के ही हैं। हालांकि तमाम अध्ययनों के बावजूद इसपर निर्णायक रूप से कोई कुछ नहीं कह सकता। कुछ स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार रूपकुण्ड दुर्घटना सन् 1150 में हुई थी जिसमें राजजात में शामिल होने पहुंचे कन्नौज नरेश जसधवल या यशोधवल और उनकी पत्नी रानी बल्लभा की सुरक्षा और मनोरंजन आदि के लिए सैकड़ों की संख्या में साथ आए दलबल की मौत हो गयी थी। उन्हीं के कंकाल आज भी रूपकुंड में बिखरे हुए हैं। 1942 में सबसे पहली बार पता चलने के बाद से इनपर काफी लोग शोध व डीएनए विश्लेषण तक कर चुके हैं, जिनमें नेशनल ज्योग्राफिक भी शामिल है। कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि कभी लोग स्वर्गारोहण की चाह में इसी स्थान से महाप्रयाण के लिए नीचे रूपकुंड की ओर छलांग लगाते थे। फिर लगभग 16 हजार फुट की ऊंचाई कोई कम भी तो नहीं। जाहिर था, नंदा राजजात यात्रा से पहले और यात्रा के शुरुआती दिनों के दौरान लोगों के बीच जिसका चर्चा व रोमांच सबसे ज्यादा था, वे रूपकुंड व ज्यूंरागली ही थे। लेकिन हैरानी की बात थी कि इस रास्ते पर लोग इतना परेशान नहीं हुए, जितना कि अंदेशा था। शायद यात्री, आयोजक व प्रशासन, सभी ज्यादा सतर्क थे। इसीलिए उतराई ने सबको चित्त कर दिया।

Yatra at Baijnath temple
Yatra at Baijnath temple

लिहाजा यह अकारण ही नहीं था कि न्यूनतम 12 साल के अंतराल पर होनी तय इस लगभग तीन सौ किलोमीटर की यात्रा के संपन्न होने के बाद, दो-तीन बातों की चर्चा सबसे ज्यादा रही- बेहद कष्टदायक उतराई और यात्रा में कई धार्मिक परंपराओं का टूटना। दबे स्वर में ही सही, इतने लोगों के एक साथ इतनी ऊंचाई पर जाने और उनके लिए होने वाले इंतजामों के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर का मुद्दा भी उठा। दूसरी बात का महत्व इसलिए भी है कि टूटती व बनती परंपराएं अगली राजजात का भी आधार बनेंगी। रही बात कष्ट की तो, ज्यादातर यात्री इसे नंदा की आराधना का ही एक पक्ष मानकर स्वीकार कर लेंगे। आखिर बात नंदा की है। नंदा कोई सामान्य देवी नहीं हैं, वह समूचे उत्तराखंड की आराध्या हैं। उत्तराखंड की समस्त देवियां उनमें समाहित हैं, वह सभी शक्तिपीठों की अधिष्ठात्री हैं। लोक इतिहास के अनुसार नंदा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुमाऊं के कत्युरी राजवंश की ईष्टदेवी थी। ईष्टदेवी होने के कारण नंदादेवी को राजराजेश्वरी भी कहा जाता है। यहां के लोगों के लिए बेटी भी हैं, शिव पत्नी पार्वती भी हैं, सती भी हैं, पार्वती की बहन भी हैं, दुर्गा भी हैं, लक्ष्मी भी हैं और सरस्वती भी। यही कारण है कि नंदा को समस्त प्रदेश में धार्मिक व सांस्कृतिक एकता के सूत्र के रूप में भी देखा जाता है। तमाम देवियों के छत्र-छंतोलियां, डोलियां व निशान इसी वजह से इस राजजात यात्रा में हाजिरी देते हैं और नंदा को ससुराल के लिए विदा करते हैं।

Traditional dance at Waan
Traditional dance at Waan

नंदकेसरी में गढ़वाल व कुमाऊं की यात्राओं के मिलन और फिर वाण में लाटू के मंदिर से पहाड़ के कठिन सफर के लिए नंदा की विदाई के मौके पर भक्ति का भावनात्मक प्रवाह नंदा में स्थानीय लोगों की अगाध श्रद्धा की गवाही दे रहा था। लेकिन देश, काल, परिस्थितियों के अनुसार धार्मिक परंपराएं बदलती हैं और नंदा देवी राजजात भी इसमें कोई अपवाद नहीं। परंपराओं के बदलने की वजहें कुछ भी हो सकती हैं। जैसे शुरुआती दौर में डोलियों व छंतोलियां की संख्या सीमित थी, लेकिन कालांतर में इनका प्रतिनिधित्व बढ़ने लगा। अब उत्तराखंड के दूर-दराज के इलाकों से छंतोलियां व निशान यात्रा में शिरकत करने लगे हैं। पिछली बार यानी 2000 में कुमाऊं की राजछंतोली पहली बार राजजात में शामिल हुई थी। इस बार सुदूर पिथौरागढ़ में मर्तोली से लंबा व दुष्कर सफर करके निशान यात्रा में शामिल हुआ। ऐसे कई उदाहरण हैं।

Bedni: highlight of the Yatra
Bedni: highlight of the Yatra

कई इतिहासकार कहते हैं कि यात्रा में पहले नरबलि का चलन था, उसके रुकने के बाद पशुबलि चलती रही। हालांकि अब वो भी रुक गई है। वाण के आगे रिण की धार से चमड़े की वस्तुएँ जैसे जूते, बेल्ट आदि व गाजे-बाजे, स्त्रियाँ-बच्चे, अभक्ष्य पदार्थ खाने वाली जातियाँ इत्यादि राजजात में निषिद्ध हो जाया करते थे। अभक्ष्य खाने वाली जातियों का तात्पर्य छिपा नहीं है। जातिगत श्रेष्ठता का तर्क यात्रा से पूरी तरह समाप्त तो नहीं हुआ है लेकिन कम बेशक हुआ है। अब बेरोकटोक महिलाएं पूरी यात्रा करने लगी हैं। इस लिहाज से यात्रा में प्रतिनिधित्व बढ़ने से कोई हर्ज तो नहीं होना चाहिए था।

Bare foot at 14K feets
Bare foot at 14K feets

लेकिन इस बढ़ती संख्या से यात्रा के स्वरूप में भी बदलाव आया है। तमाम छंतोलियां व डोलियां अपने साथ श्रेष्ठता का एक भाव भी लाती हैं। नौटी व कुरूड़ के बीच का विवाद तो काफी समय से है। नंदा में चूंकि स्थानीय लोगों की श्रद्धा अगाध है और राजजात में शिरकत करने वालों की संख्या कई हजारों में होती है, इसलिए छंतोलियों के क्रम व उनकी स्थिति को लेकर एक होड़ सी रहती है। लोगों की भेंट व चढ़ावा भी इसकी एक वजह होते हैं। ऐसे में यात्रा का मूल क्रम ही बिगड़ गया। मान्यता यह रहती थी कि यात्रा में सबसे आगे चौसिंघा खाड़ू चलता है और उसके पीछे लाटू का निशान, गढ़वाल व कुमाऊं की राज छंतोलियां और पीछे बाकी छंतोलियां व यात्री। लेकिन इस बार ऐसा कोई क्रम न था। छंतोलियां व यात्री अपनी जरूरत व सहूलियत के हिसाब से आगे पीछे चल रहे थे और पड़ाव तय कर रहे थे। नंदा यानी मुख्य यात्रा के होमकुंड पहुंचने से पहले ही कई यात्री व छंतोलियां होमकुंड में पूजा करके वापसी की राह पकड़ चुके थे। और तो और, यात्रा में इतने खाड़ू थे कि कौन सा मुख्य है, यात्री इसी भ्रम में थे। लेकिन यह सब भी उतनी बड़ी बातें नहीं थीं, जितनी इसके पीछे के अंतिर्निहित तनाव थे। मान्यतानुसार जिन लोगों को वाण से आगे नंदा की डोली उठानी थी, उन्हें उठाने ही नहीं दी गई, लिहाजा सुतौल के द्योसिंह देवता का निशान यात्रा पूरी किए बिना ही बेदनी बुग्याल से लौट गया। बदले में विवाद की आशंका में होमकुंड से लौटते हुए नंदा की डोली सुतौल रुकी ही नहीं, सीधे घाट चली गई जिसपर लोगों में खासी नाराजगी रही। ऐसे ही कुछ और भी विवाद रहे। इंतजामों को लेकर पतर-नचैनिया व बेदिनी में लोगों की जमकर नारेबाजी व विरोध प्रदर्शन का नजारा भी अखरने वाला था।

long wait to go towards Homkund
long wait to go towards Homkund

इतनी बड़ी यात्रा में इंतजामों की कमी स्वाभाविक थी। खास तौर पर यह देखते हुए कि यात्रियों की संख्या को लेकर न कोई अनुमान था और न ही उस अनुपात में इंतजाम। फिर ऊंचाई वाले इलाके में वाण से लेकर वापस सुतौल पहुंचने तक हर दिन बारिश हुई, जिससे इंतजामों पर असर पड़ा, रास्ते में तकलीफें बढ़ीं। राहत की बात यही थी कि इस सबके बावजूद यात्रा में कहीं कोई हादसा न हुआ। लेकिन ऐसे विकट इलाके में यात्रा का लगातार बढ़ता स्वरूप पर्यावरणविदों के लिए बड़ी चिंता का सवाल है। चमोली के एडीम व मेला अधिकारी एम.एस. बिष्ट कहते हैं कि सरकारी अनुमानों के मुताबिक 20 से 25 हजार यात्री वाण से ऊपर की ओर गए। बेदिनी से ऊपर का इलाका इतना संवेदनशील है कि वहां जोर से बोलने तक के लिए मना किया जाता है। हालांकि बेदिनी बुग्याल व रूपकुंड क्षेत्र रोमांच प्रेमियों व ट्रैकर्स में बेहद लोकप्रिय है। वहां की पारिस्थितिकी और प्राकृतिक खूबसूरती को कैसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सलामत रखा जाए, यह कम महत्व का मुद्दा नहीं।

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क्या है नंदा राजजात

Mysterious Roopkund!
Mysterious Roopkund!

आस्था, रहस्य व रोमांच। नंदा देवी की राजजात यात्रा इन सबका मिला-जुला रूप है। हजारों लोगों के रेले में राह दिखाता सबसे आगे चलता चार सींग वाला काला मेढ़ा, नंदादेवी की राजछंतोली के पीछे चलती उत्तराखंड के गांवों-गांवों से आई छंतोलियां, सबके साथ वीर व पश्वाओं की टोली- भक्ति से सराबोर होकर पहाड़ों को नापती। इसे हिमालयी कुंभ भी कहा जाता है क्योंकि कुंभ की ही तर्ज पर यह यात्रा 12 साल में एक बार होती है। स्वरूप में यह यात्रा है क्योंकि इसमें शिरकत करने वाले लोग 19 दिन तक एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव की ओर चलते रहते हैं। एशिया की इस सबसे लंबी यात्रा में लगभग तीन सौ किलोमीटर का सफर तय किया जाता है। इतना ही नहीं, इसमें से छह दिन की यात्रा हिमालय के कुछ सबसे दुर्गम, ऊंचाई वाले इलाके में की जाती है। पिछली यात्रा 2000 में हुई थी। इस लिहाज से 2012 में अगली यात्रा होनी थी। लेकिन उस साल एक मलमास (अधिक मास) के कारण यात्रा का संयोग नहीं बना। पिछले साल भी यात्रा की तारीखें तय हो गई थीं, लेकिन केदारनाथ इलाके में जो भयंकर तबाही जून में हुई थी, उसके बाद न तो प्रशासन में और न ही लोगों में यात्रा करने की हिम्मत बची थी। अब इस साल यह यात्रा हो रही है। यात्रा कब से हो रही है, इसका ठीक-ठीक कोई इतिहास नहीं मिलता। राजजात समिति के पास जो अभिलेख हैं, उनके अनुसार 1843, 1863, 1886, 1905, 1925, 1951, 1968, 1987 व 2000 में यात्रा का आयोजन हो चुका है। यानी बीते डेढ़ सौ साल में यह कभी भी 12 साल के अंतराल पर नहीं हो पाई है। जाहिर है, यह यात्रा से जुड़ी मान्यताओं व दुर्गमताओं, दोनों की वजह से है। बहरहाल, तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए इस साल 18 अगस्त को उत्तराखंड में कर्णप्रयाग के निकट नौटी से शुरू हुई यात्रा 6 सितंबर को नौटी में ही समाप्त हुई।

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सतरंगी यात्रा का रोमांच

बेदनी बुग्याल और पीछे त्रिशूल पर्वत
बेदनी बुग्याल और पीछे त्रिशूल पर्वत

आली बुग्याल बेदनी से महज तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर है। खूबसूरती में भी वो बेदनी बुग्याल के उतना ही नजदीक है। कुछ रोमांचप्रेमी घुमक्कड़ आली को ज्यादा खूबसूरत मानते हैं। मुश्किल यही है कि आली को उतने सैलानी नहीं मिलते जितने बेदनी को मिल जाते हैं। जानकार लोग आली की इस बदकिस्मती की एक कहानी भी बताते हैं। किस्सा आली व ऑली में एक टाइपोग्राफी चूक का है। दोनों ही जगह उत्तराखंड में हैं। ऑली बुग्याल जोशीमठ के पास है और इस समय देश के प्रमुखतम स्कीइंग रिजॉर्ट में से एक है। कहा जाता है कि ऑली को मिलने वाली सुविधाएं आली को मिलनी तय थीं। लेकिन बस फैसला होते समय नाम में कोई हर्फ या हिजा इधर से उधर हुआ और आली की जगह ऑली की सूरत बदल गई। हालांकि मेरी नजर में ऑली के हक में एक बात और यह भी जाती है कि वह सड़क के रास्ते में है। जोशीमठ से ऑली के लिए सड़क भी है और रोपवे भी।

15 हजार फुट की ऊंचाई पर राजनीतिक बैनर
15 हजार फुट की ऊंचाई पर राजनीतिक बैनर

आली यकीनन खूबसूरत है, लेकिन बेदनी बुग्याल चूंकि बहुचर्चित रूपकुंड ट्रैक के रास्ते में है इसलिए सैलानी अपना बेस बेदनी को बनाते हैं। आली के साथ एक दिक्कत यह भी है कि वहां पानी का कोई स्रोत नहीं है। बेदनी में बड़ा सा तालाब है जो उसकी अहमियत बढ़ा देता है। इस तालाब का तर्पण आदि के लिहाज से धार्मिक महत्व भी है, लिहाजा इसे वैतरिणी कुंड भी कहते हैं। इसी बेदनी कुंड के एक किनारे मंदिर में नंदा, महिषासुर मर्दिनी और काली की अति प्राचीन मूर्तियां स्थापित हैं। वहीं पर शिव का भी मंदिर बना है। मान्यता यह है कि बेदनी में ही वेदों की रचना की गई, इसी से इस जगह का नाम बेदनी पड़ा। इसीलिए हर साल कुरूड़ में नंदा देवी के सिद्धपीठ से निकलने वाली छोटी जात बेदनी तक आती है और 12 साल में एक बार होनी तय राजजात का भी यह प्रमुख पड़ाव माना जाता है।

आगे मेेढ़ा और पीछे नंदा राजजात का यात्री
आगे मेेढ़ा और पीछे नंदा राजजात का यात्री

लगभग 11 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित बेदनी और लगभग 12 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित बेदनी से लगा हुआ आली लगभग 12 किलोमीटर के इलाके में फैले हुए हैं। मखमली घास के इन बुग्यालों में कई रंगों के फूल खिलते हैं। कई जड़ी-बूटियां यहां मिलती हैं। यहां के कुदरती नजारे, रंग बिरंगे फूलों से सजी मुलायम घास और कोहरे, बादल, धूप व बारिश की लुका-छिपी का खेल अदभुत व दुर्लभ है। बेदनी व आली में चारों तरफ फैले कई किलोमीटर के घास के ढलान स्कीइंग के बिलकुल माफिक हैं, लेकिन अभी उनका इस्तेमाल उस तरह से ज्यादा होता नहीं। स्थानीय लोग इन बुग्यालों पर भेड़-बकरी और घोड़े-खच्चर चराते हैं। बुग्याली घोड़े भी बेहद आकर्षक होते हैं और सुंदर-सजीले घोड़े इतनी ऊंचाई पर कुंलाचे मारते दिख जाएं तो भला क्या बात है।

वाण में कैंपिंग
वाण में कैंपिंग

इतनी ऊंचाई की एक और मनमोहक खूबसूरती यहां से सूर्योदय व सूर्यास्त का शानदार नजारा है। बेदनी बुग्याल के ठीक सामने एक तरफ नंदा घुंटी चोटी है और दूसरी तरफ त्रिशूल। आली से दिखने वाला नजारा तो और भी खूबसूरत है। मौसम खुला हो और तड़के जल्दी उठने की हिम्मत कर सकें तो इन चोटियों पर पड़ने वाली सूरज की पहली किरण की खूबसूरती का कोई जवाब नहीं। इसे केवल यहां आकर ही महसूस किया जा सकता है, तस्वीरें देखकर नहीं। इसीलिए राजजात यात्रा में शरीक होने वालों से यह हमेशा कहा जाता रहा है कि आगे का सफर बेशक कठिन है लेकिन जब निकलें हैं तो बेदिनी तक जरूर जाएं।

लेकिन बेदनी पहुंचना भी इतना आसान तो नहीं। पहाड़ी आलू के लिए प्रसिद्ध वाण इस रास्ते का आखिरी गांव हैं। यहां से लगभग तीन किलोमीटर की सामान्य चढ़ाई के बाद रण की धार नामक जगह आती है। उसके बाद लगभग दो किलोमीटर का ढलान है और फिर नीचे नदी पर बने पुल से गैरोली पाताल होते हुए डोलियाधार तक सात किलोमीटर की दम फुला देने वाली खड़ी चढ़ाई। कहा जाता है कि पहले यही पुल राजजात यात्रा के समय महिलाओं के लिए आखिरी सीमा हुआ करता था। नंदा को विदा करने औरतें उस पार नहीं जाती थीं। बहरहाल, अब महिलाएं होमकुंड तक पूरी राजजात बेहिचक करती हैं।

इनकी धुनी तो कहीं भी रम जााएगी
इनकी धुनी तो कहीं भी रम जााएगी

जब बेदनी जाने की धुन हो तो ऊंचाई नाप ही ली जाती है। लेकिन आपकी अपनी यात्रा धार्मिक श्रद्धा से प्रेरित न हो तो इतने मुश्किल रास्तों पर लोगों को नंगे पैर चढ़ते देख खासी हैरानी होती है। मेरे लिए बेदनी-रूपकुंड ट्रैक की यह पहली चढ़ाई थी। साथ ही यह अंदाजा भी था कि जिस भारी तादाद में लोग राजजात यात्रा में शामिल होकर ऊपर जा रहे हैं, उसमें इन जगहों की प्राकृतिक खूबसूरती को उस शिद्दत के साथ महसूस कर पाना मुमकिन नहीं होगा। हकीकत भी यही थी। अस्थायी हैलीपेड से दिन में दसियों उड़ानें भरता हेलीकॉप्टर, घास के ढलानों पर पसरी पड़ी सैकड़ों टेंटों की कई सारी कॉलोनियां, ठौर-ठिकाना न मिलने पर नारेबाजी करते श्रद्धालु- लगता नहीं था कि हम 12 हजार फुट की ऊंचाई पर हैं। बेदनी पहुंचते-पहुंचते हुई भारी बारिश ने पहले ही हालत पतली कर दी थी।

ब्रह्मकमल तोड़कर ले जाते यात्री
ब्रह्मकमल तोड़कर ले जाते यात्री

इसीलिए आली जाने का और भी मन था क्योंकि बेदनी को उसके मूल रूप में देखना दूभर था। इतनी ऊंचाई पर इतने लोगों के एक साथ पहुंचने का यह डर तो है ही। चमोली के एडीएम और राजजात यात्रा के लिए नियुक्त मेला अधिकारी एम.एस. बिष्ट का कहना था कि सरकारी अनुमानों के अनुसार बेदनी में 20 से 25 हजार के लगभग यात्री पहुंचे होंगे। इतने लोगों का एक साथ रुकना, उनके लिए (हजारों) टेंट जमीन में गाढ़े जाना, उनके लिए चाय-नाश्ते, खाने-पीने के इंतजाम करना, उठना-बैठना, पूजा-पाठ, शौच-नित्य कर्म… फिर उनके आने-जाने के लिए रास्ते तैयार करना- उस जगह के हाल की कल्पना की जा सकती है। एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव के बीच के रास्ते पर फैलने वाला कचरा अलग। उसपर भी मुश्किल यह थी कि बेदनी से ऊपर बगवाबासा का इलाका ब्रह्मकमल व फेनकमल से भरा है और सब तरफ जड़ी-बूटियां फैली पड़ी हैं। पहाड़ के लोग कई बूटियां पहचानते भी हैं। ऐसे में दुर्लभ फूलों और जड़ी-बूटियों को नोचकर अपने झोलों व बैगों में भरकर ले जाने वालों की भी तादाद कम न थी। ऊपर रूपकुंड में बिखरे पड़े सदियों पुराने रहस्यमय नरकंकाल सैलानियों, यात्रियों के लिए ट्रॉफी की तरह हो जाते हैं- कुछ उन्हें तमगे की तरह साथ रख लेते हैं, कुछ उनके साथ सेल्फी खींचने को बेताब रहते हैं। इसलिए वे कुंड में अपनी मूल जगह से दूर अलग-अलग कोनों पर चट्टानों पर विविध डिजाइन में सजे नजर आते हैं।

ऑली से इंद्रधनुषीय नजारा
ऑली से इंद्रधनुषीय नजारा

खैर, बेदनी में फुर्सत की शाम का फायदा उठाते हुए आली बुग्याल तक जाने की एक वजह यह भी थी कि बेदनी में कोई मोबाइल नेटवर्क काम नहीं कर रहा था और आली में उसके मिलने की उम्मीद थी। आली जाने वाला हम चार-पांच साथियों के अलावा और कोई न था। रास्ता आसान था। रिमझिम बारिश ने माहौल तो खूबसूरत कर दिया था लेकिन कैमरों को भी भीतर रहने के लिए मजबूर कर दिया था। अचानक बारिश थोड़ी हल्की हुई, दूर पश्चिम में क्षितिज में डूबते सूरज की हल्की सी रोशनी चमकी और देखते ही देखते पूरब का बादलों ढका आसमान इंद्रधनुषी रंगों में नहा गया। अरसे बाद दोहरा इंद्रधनुष देखा और अरसे बाद पूरा इंद्रधनुष देखा जो नजरों के सामने आसमान के पूरे विस्तार में एक छोर से दूसरे छोर तक अपनी प्रत्यंचा ताने हुए था। मेरे लिए पूरी नंदा राजजात यात्रा का सबसे खुशनुमा पल वही था।

Photo of the day- A colony in clouds

A tent colony in clouds or on the edge of a cliff! A scene not common,considering the fact that this is at an altitude of almost 13 thousand feets, deep inside one of the most beautiful Himalayan interiors and at one of the most fascinating meadows- Bedni Bugyal. Not so common scene also because it would be next seen at least after 12 years, when next Nanda Devi Rajjat Yatra takes place. Only then again thousands of pilgrims (this time they were more than 20 thousand) will be reaching here and so many tents would be needed to accommodate them. A magnificent sight terrifying at the same time!!

Colony in clouds

Traditional dance of Garhwal- Jhora at Waan

Jhora at WaanTraditional folk dance at Waan during Nanda Devi Rajjaat Yatra 2014. Last inhabitated village on Rajjaat route towards Bedini Bugyal, Waan is famous for its Latu temple. Latu is considered to be brother of Goddess Nanda Devi. Here onwards Latu leads the Yatra till Homkund.

The video here is of traditional ‘Jhora’ in Nanda Devi’s praise by men & women in traditional attire. Most special are women ornaments,  these ornaments also reflect their social status. Sung in local dialect, group of men first recite a couplet, which is repeated by the women folk. This can go on for hours, the flow of words and rhythm (steps as well) of dance keep on changing, but tempo remains the same.

Normally it is a slow paced dance. People keep on joining or moving out of the sequence as per their convenience. Men and women dance and move in a same circle formation but as two different groups. Men will never hold hands of women during the dance. Such ‘Jhoras’ are now a rarity, seen only in times of Yatra or big religious festivals.