Luxury trains undergo makeover

Palace on Wheels ready to move from Delhi
Palace on Wheels ready to move from Delhi

Rajasthan in India will spend over Rs.1.47 crores on refurbishing two luxury trains – the Palace on Wheels and the Rajasthan Royal on Wheels – this year, a tourism official said.The Palace on Wheels, a joint venture of Indian Railways and Rajasthan Tourism Development Corporation (RTDC) is in for major refurbishment at an investment of Rs.1 crore.

RTDC will also give another world-famous luxury train, the Royal Rajasthan on Wheels, a makeover at an investment of Rs.47 lakh, in a bid to deliver a richer, royally enchanting experience to each guest. Based on the feedback of guests, we have undertaken redecoration of the Palace on Wheels. The luxury tourist train will sport a new heritage look. Modernisation of even minor things is being undertaken, including water purifiers in washrooms and other modern conveniences like superior communication and entertainment.

 

A luxury suite if the Royal Rajasthan on wheels
A luxury suite if the Royal Rajasthan on wheels

Even the dining car, the bar and the lounge will take on a wonderful new look. The spa and health club will also receive major upgrades. There are also plans to introduce more and more facilities to please guests. The Palace on Wheels tour covers Delhi, Jaipur, Sawai Madhopur (Ranthambore), Udaipur, Jaisalmer, Jodhpur and Bharatpur. The Royal Rajasthan on Wheels takes guests from Delhi to Jodhpur, Udaipur, Chittorgarh, Sawai Madhopur (Ranthambore), Jaipur, Khajuraho, Varanasi and the Taj Mahal.

On quite a few occasions the Palace on Wheels has hosted richly royal weddings and for people who plan to wed the way maharajas did, train will be offering more once the train undergoes transformation. New carpets, tapestry, curtains, replacement of furniture and up-gradation of toilets in both the trains are also being taken up. The wooden floors would have richly luxurious carpets to minimise noise.

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New special tourism zones

One of the last tigers of Panna, before they disappeared from the park few years ago
One of the last tigers of Panna, before they disappeared from the park few years ago

In order to tap its tourism potential, six new special tourism zones have been declared in Madhya Pradesh in central India. The new special tourism zones include – Salkanpur, Chitrakoot, Panna, Choral, Maheshwar and Amarkantak. The state government has issued notification to this effect and with this, the number of special tourism zones has gone up to 16 in the state.

Under new special tourism zones, water, adventure and eco tourism activities are proposed in Rehti, Nasrullaganj and Budhni tehsils of Sehore district, Majhgawan tehsil of Chitrakoot in Satna, Panna, Pawai, Gunnaur and Raipura tehsils in Panna district, Choral in Dr Ambedkar Nagar Mhow tehsil in Indore, Maheshwar and Kasrawad tehsils in Khargone and Amarkantak in Pushprajgarh tehsil of Anuppur district.

अराउंड द वर्ल्ड फॉर अ रिकॉर्ड

World Tripसैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहा… इन पंक्तियों से यूं तो कई लोग घुमक्कड़ी की प्रेरणा हासिल करते हैं, लेकिन कुछ बिरले ही हैं जो वाकई दुनिया की सैर करने की हिम्मत जुटा पाते हैं। अब जनाब दुनिया की सैर करना इतना आसान भी तो नहीं। अराउंड द वर्ल्ड इन एट डॉलर्स, देखने में भले ही कितनी रोमांचक क्यों न लगे, वैसा  हकीकत में कम ही हो पाता है।

तुषार अग्रवाल और संजय मदान नाम के दो रोमांचप्रेमी युवाओं ने सड़क और समुद्र के रास्ते दुनिया की सैर करने का बीड़ा उठाया है। इसके लिए वे  छह महाद्वीपों में स्थित पचास देशों  से गुजरेंगे और कुल सत्तर हजार किलोमीटर का सफर तय करेंगे। उन्होंने इसे ग्रेट इंडियन वल्र्ड ट्रिप नाम दिया है। तुषार व संजय के नाम पहले ही लिम्का बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉड्र्स में सात रिकॉर्ड दर्ज हैं। ये सातों रिकॉर्ड सड़कों पर अलग-अलग सफर के नाम हैं। इस वल्र्ड ट्रिप का मकसद भारत को उन देशों तक ले जाना, वहां प्रवासी भारतीयों व आम लोगों से मिलना है। इस सफर को बाकायदा एक डॉक्यूमेंट्री के रूप में रिकॉर्ड भी किया जाएगा।

तुषार अग्रवाल
तुषार अग्रवाल

इस ट्रिप का रास्ता बड़ी सोच-समझकर उन देशों से होते हुए तैयार किया गया है जहां भारतीयों की आबादी अच्छी संख्या में है और जहां से बड़ी तादाद में सैलानी भी भारत आते हैं। तुषार व संजय का यह सफर पूर्व की ओर से शुरू होगा। म्यांमार, थाईलैंड व मलेशिया होते हुए वे सिंगापुर पहुंचेंगे। वहां से वे आस्ट्रेलिया जाएंगे। पूरे आस्ट्रेलिया का भ्रमण करने के बाद वे पश्चिम की ओर मुड़ेंगे और समुद्र के रास्ते अफ्रीका पहुंचेंगे। केन्या से शुरू करके वे नीचे दक्षिण में तंजानिया, नामीबिया, बोत्सवाना, विक्टोरिया फॉल्स होते हुए दक्षिण अफ्रीका में केप टाउन पहुंचेंगे। उसके बाद फिर से समुद्र के रास्ते दक्षिण अमेरिका पहुंचेंगे जहां दुनिया के सबसे दक्षिणवर्ती शहर अर्जेंटीना के उशुआइआ से ऊपर चढ़ना शुरू करेंगे।

 

World Trip1उसके बाद वे ऊपर की ओर पैन अमेरिकन हाइवे पर चलेंगे, जिसे दुनिया का सबसे लंबा हाइवे कहा जाता है। यह हाइवे उन्हें चिली, पेरू, इक्वाडोर व कोलंबिया होते हुए मध्य अमेरिकी देशों- पनामा, ग्वाटेमाला, होंडुरास व मैक्सिको ले जाएगा। उसके बाद वे अमेरिकी महाद्वीप के सबसे उत्तरी छोर डेडहोर्स तक जाएंगे। अलास्का के उसे हिस्से का रोमांच लेने के बाद वे कनाडा पार करके न्यूयार्क आएंगे और यहां से फिर समुद्र पार करके पूर्व में लंदन पहुंचेंगे। इसके बाद शायद उनकी ट्रिप का सबसे सुहाना व आसान सफर शुरू होगा। पश्चिमी यूरोप, पूर्वी यूरोप नापकर व एशिया में ईरान पहुंचेंगे और अंतत: फिर से मुंबई।

तुषार व संजय पहले भी 51 दिन में 15 देशों को पार करते हुए लंदन से दिल्ली आने का रिकॉर्ड बना चुके हैं। पिछले साल उन्होंने नौ देशों की आसियान कार रैली में भी हिस्सा लिया था।

टॉप टेन में घूमर

राजस्थान के पारंपरिक व सर्वाधिक लोकप्रिय नृत्य घूमर को विश्व के सर्वोत्कृष्ट 10 स्थानों में से चौथा स्थान मिला है। एक इंटरनेशनल ऑनलाइन ट्रैवल पोर्टल ने दुनिया के सभी नृत्यों को विभिन्न मानदंडों पर परखते हुए ‘‘घूमर‘‘ को चौथा स्थान दिया है। इस कड़ी में यह भारत का एकमात्र नृत्य है। पहले स्थान पर हवाई, दूसरे स्थान पर जापान का बोन ओडोरी और तीसरे स्थान पर आयरलैंड का नृत्य रहा है।

राजस्थान का मशहूर घूमर नृत्य
राजस्थान का मशहूर घूमर नृत्य

‘‘घूमर‘‘ राजस्थान की पारंपरिक नृत्यशैली है जिसमें विभिन्न मांगलिक व खुशी के अवसरों पर महिलाएं श्रृंगारिक नृत्य करती है। मुगलकालीन युग में औरतें पुरुषों से पर्दा करती थीं, लिहाजा यह नृत्य मुंह ढककर होता था। अब तब कमोबेश उसी तरह नृत्य करने की परंपरा चली आ रही है। राजमहलों, सामंतों, राजपूतों के घरों में विशेष रूप से किया जाने वाला यह नृत्य राजपूतों की महिलाओं की अन्य सूबों में शादियों के साथ अनेक स्थानों पर विभिन्न रूपों में प्रचलित हो गया। विशेषत: गणगौर विवाह आदि अवसरों पर यह नृत्य महिलाओं द्वारा स्वान्त: सुखाय किया जाता है। रंग-रंगीले पहनावे और गहनों से लक-दक महिलाएं जब स्त्रियोचित नजाकत के साथ इस नृत्य को करती है तो देखने वाले रोमांचित हो जाते हैैं। कालांतर में यह रजवाड़ों से निकलकर विद्यालयों में सिखाया जाने लगा लेकिन इसके बोलों, तालों व लय में एकरूपता न होने से अनेक रूपों में प्रचलित हो गया। इसी तरह सावन के महीने में मौज-मस्ती में भी घूमर नृत्य खूब किया जाने लगा।

गणतंत्र दिवस परेड और विदेशों में प्रस्तुति से इस नृत्य को प्रचार-प्रसार मिला। राजपथ पर घूमर का प्रदर्शन तीन बार हो चुका है। अमेरिका, कनाडा, सऊदी अरब, जर्मनी, कम्बोडिया, वियतनाम, ब्रिटेन आदि देशों में घूमर के कई शो और प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित हो चुके हैैं। इस नृत्य को किए जाने के लिए साज के रूप में नगाड़ा व शहनाई की जरूरत होती थी। यह साज धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे थे। ऐसी स्थिति में नृत्य की विशेषता को देखते हुए इसे फिर से लोकप्रिय बनाने की बहुत कोशिशें हुई हैैं। 1999 में पहला ‘‘घूमर‘‘ अलबम जारी हुआ था। तमाम प्रयासों से घूमर के कई प्रदर्शन हुए, स्कूलों में इसे सिखाने की कोशिशें हुईं। वीणा समूह ने 2006 में जयपुर में राजस्थान विधानसभा के सामने जनपथ पर 2000 महिलाओं द्वारा घूमर नृत्य का अभूतपूर्व आयोजन करवाया। अगले साल 2007 में इसे आगे बढ़ाते हुए जयपुर के त्रिपोलिया दरवाजे को मंच बनाते हुए बड़ी चौपड से छोटी चौपड़ तक 5000 महिलाओं द्वारा 70-70 महिलाओं के 74 गोले बनवाकर नृत्य की अभूतपूर्व प्रस्तुति करवाई गई।

केरल जाने का सबसे खूबसूरत समय

केरल की ये नावें सैलानियों के लिए बड़ा आकर्षण हैं
केरल की ये नावें सैलानियों के लिए बड़ा आकर्षण हैं

केरल का मानसून गोवा की ही तरह खास है। हरा-भरा, हर तरफ हरियाली, पानी और मस्ती। इसीलिए यहां नदियों व पानी के सबसे ज्यादा उत्सव इन्ही दिनों में हुआ करते हैं। केरल की सबसे लोकप्रिय बोट रेस प्रतिस्पर्धाएं मानसून में ही होती हैं, जिन्हें देखने के लिए दुनियाभर से सैलानी जुटते हैं। एक झलक केरल में इन दिनों होने वाले आयोजनों पर-

नेहरू ट्रॉफी बोट रेस: अल्लपुझा के बैकवाटर्स में स्थित पुन्नमडा झील में होने वाली यह बोट रेस सबसे प्रसिद्ध है। हर साल अगस्त महीने के दूसरे शनिवार को होने वाली इस रेस का इस साल आयोजन 10 अगस्त को हुआ है। इस आयोजन में चुंदन वेलोम (स्नेक बोट) की पारंपरिक दौड़ के अलावा पानी पर झांकियां भी होती हैं। इस दौड़ को देखना अपने आप में दुर्लभ अनुभव है।

पय्यपड़ बोट रेस: अल्लपुझा में ही पय्यपड़ नदी में एक अन्य बोट रेस हुआ करती है। नेहरू ट्रॉफी बोट रेस के बाद स्नेक बोट की सबसे बड़ी रेस केरल में यही है। एक प्राचीन कथा के अनुसार इस रेस का आयोजन हरीपाद मंदिर में सुब्रह्मण्य स्वामी मंदिर में मूर्ति की स्थापना से जुड़ा है। वहां ग्रामीणों को सपने में निर्देश मिले जिसके बाद वे कायमकुलम झील में एक चक्रवात तक पहुंचे, जहां उन्हें मूर्ति प्राप्त हुई। इस साल यह रेस 18 सितंबर को आयोजित की जाएगी।

अर्णामुला वल्लमकली: यह बोट रेस अपनी लंबी परंपरा और भव्यता के लिए जानी जाती है। यह रेस कम और पारंपरिक रस्म ज्यादा है। इस साल इसका आयोजन 20 सितंबर को होगा। अर्णामुला में पंबा नदी में होने वाला यह आयोजन दरअसल ओणम समारोहों का ही हिस्सा है। इसके पीछे बताया जाता है कि एक बार एक ब्राह्मण ने अर्णामुला पार्थसारथी मंदिर में थिरुवोणम पर होने वाले पारंपरिक भोज के लिए अपनी सारी संपत्ति समर्पित करने की घोषणा की। इस भेंट के साथ लदी नाव (थिरुवोना थोनी) पर कुछ लोगों ने हमला बोल दिया। आसपास के गांववालों को इसका पता चला तो उन्होने बचाव में अपनी सर्प नौकाएं भेजीं। तभी से  भागवान पार्थसारथी को सर्प नौकाओं की दौड़ के रूप में भेंट भेजने की रस्म की शुरुआत हो गई।

कुमारकोम बोट रेस: जिस दिन (इस साल 18 सितंबर) पय्यपड़ में बोट रेस होती है, उसी दिन प्रसिद्ध रिजॉर्ट कुमारकोम में भी श्री नारायण जयंती बोट रेस होती है। यह रेस केरल में होने वाली बाकी रेसों से अलग है। यह रेस महान समाज सुधारक श्री नारायण गुरु के इस गांव में आने की याद में आयोजित की जाती है। बताया जाता है कि नारायण गुरु 1903 में नाव में बैठकर अल्लपुझा से कुमारकोम आए थे। उनके साथ कई नावों में  लोग थे। हर साल उनकी जयंती पर उस दिन की याद में यह बोट रेस होती है।